यह रेखा ग़रीबों की गरदन से गुज़रती है
उन्नीसवीं सदी के प्रसिद्ध समाजशास्त्री हरबर्ट स्पेंसर ने शायद सबसे पहली बार आधिकारिक तौर पर सामाजिक परिक्षेत्र में योग्यतम की उत्तरजीविता के मुहावरे का प्रयोग किया था। उनका मानना था कि ग़रीब लोग आलसी होते हैं, काम नहीं करना चाहते और जो काम नहीं करना चाहते उन्हें खाने का भी कोई अधिकार नहीं है। इसी आधार पर उनका तर्क था कि गरीबी उन्मूलन जैसी योजनाओं के ज़रिये सरकार का हस्तक्षेप न्यूनतम होना चाहिये। दरअसल, स्पेन्सर पूंजीवादी दुनिया के वैचारिक प्रतिनिधि के रूप में सामने आते हैं। जिस व्यवस्था के लिये ग़रीब सिर्फ़ बोझ हैं और देश-दुनिया के सारे संसाधनों पर सिर्फ़ पूंजीपति वर्ग का अधिकार है और जिसके मूल में ही असमानता का विमर्श अंतर्निहित है। यह व्यवस्था सीधे-सीधे समाज को दो हिस्सों में बांटती है, पहला जिसके पास संसाधनों का स्वामित्व है और दूसरा जो उसके हित में उसके लाभ की वृद्धि के लिये काम करने के बदले अपनी आजीविका कमाता है। ऐसे में लाभ को अधिकतम करने का मोह अपने कामगारों की विशाल आबादी को बस उतना ही देने के लिये प्रेरित करता है जितने से वह ज़िन्दा रह सके और उसके लिये काम कर सके। यह विचार सरणी ग़रीबी के लिये ग़रीबों को ही ज़िम्मेदार ठहराती है और इस तथ्य को छिपाती है कि पूंजीवादी विकास प्रक्रिया के मूल में ही आबादी के बड़े हिस्से का निरंतर विपन्न होते जाना अंतर्निहित है। सिमोन द बोऊवा ने पितृसत्तात्मक समाज में औरत के बारे में जो कहा था वही पूंजीवादी समाज में ग़रीब के लिये कहा जा सकता है – ग़रीब पैदा नहीं होते बनाये जाते हैं! जिस तरह लाभ और पूंजी का लगातार सीमित हाथों में संकेन्द्रीकरण होता है उसमे स्वाभाविक ही है कि आबादी के बड़े हिस्से से उसकी मिल्कियत छीनकर उसे सर्वहारा में तब्दील कर दिया जाये। अपने देश में सेज़ और ऐसी ही तमाम परियोजनाओं के नाम पर ज़मीनों पर बेतहाशा कब्ज़ा , कृषि के कारपोरेटीकरण द्वारा छोटे और मध्यम किसानों के विनाश और श्रम क़ानूनों में ढील के नाम पर श्रमिक की असुरक्षा में भयावह वृद्धि जैसी समकालीन प्रक्रियाओं में इस लाक्षणिकता को आसानी से लक्षित किया जा सकता है।
बीसवीं सदी के आरंभिक वर्षों में रूस सहित कई देशों में समाजवादी शासन व्यवस्थाओं की स्थापना और पूरी दुनिया में समाजवाद की एक विचार के रूप में प्रतिष्ठा तथा तद्जन्य सामाजिक- राजनैतिक आलोड़नों के बरअक्स पूंजीवाद के लिये मानवीय चेहरा अपनाना आवश्यक हो गया था। फिर भी तीस के दशक की महामंदी के दौर में क्लासिकल अर्थव्यवस्था के लैसेज़ फ़ेयरे ( सरकार के हस्तक्षेप से पूर्णतः मुक्त बाज़ार आधारित अर्थव्यवस्था) सिद्धांत को तिलांजलि देकर कीन्स की राज्य हस्तक्षेप पर आधारित नीतियों का लागू किया जाना पूरी दुनिया की पूँजीवादी व्यवस्थाओं की मज़बूरियों को प्रदर्शित करता था न कि उनकी प्रतिबद्धताओं और पक्षधरताओं में किसी परिवर्तन को। मंदी से उबरने के साथ ही जब कालांतर में पूंजीवाद ने ख़ुद को फिर मज़बूत किया तो इस सैद्धांतिक अवस्थिति में भी परिवर्तन हुआ और पाल ए सैमुएल्सन जैसे सिद्धांतकारों ने कीन्सीय तथा क्लासिकीय सिद्धांतो के घालमेल से नवक्लासिकीय सिंथेसिस की जिस अवधारणा को जन्म दिया था उसकी तार्किक परिणिति नव उदारवादी सिद्धांतों की पुनर्स्थापना के रूप में होनी तय थी। भारत सहित दुनिया के अधिकांश हिस्से में मिश्रित अर्थव्यवस्था की नीति के तहत कल्याणकारी राज्य की जो अवधारणा प्रस्तुत की गई थी वह नब्बे के दशक में सोवियत संघ के विघटन के बाद लागू संरचनात्मक संयोजन वाली नई आर्थिक नीतियों से प्रतिस्थापित कर दी गयी। वैसे यह कल्याणकारी राज्य भी मूलतः पूंजीपति वर्ग के कल्याण के लिये ही था। असल में, कीन्स ने मांग की कमी को मंदी का मुख्य कारण माना था। उसका मानना था कि जे बी से का नियम (जो कुछ उत्पादित हुआ है उसके लिये मांग भी है) अर्थव्यवस्था में लागू नहीं होता। लोगों के पास बाज़ार में उपलब्ध सामान ख़रीदने के लिये पैसे नहीं होते तो प्रभावी मांग घटने लगती है जिससे कालांतर में क़ीमतें गिरने लगती हैं और अंततः मंदी की स्थितियां उतपन्न होती हैं। इसीलिये उनका सुझाव था कि सरकारों को अपनी कल्याणकारी योजनाओं के माध्यम से लोगों की क्रय शक्ति को एक न्यूनतम स्तर पर बनाये रखना चाहिये। स्पष्ट तौर पर इस कल्याण में आर्थिक असमानता को दूर करने या फिर एक समतामूलक समाज की स्थापना का प्रस्ताव नहीं था। पूरा ज़ोर पूंजीवादी व्यवस्था को जीवित रखकर उत्पादकों के लिये स्थायी बाज़ार उपलब्ध कराना ही था। समाजवाद के तत्कालीन प्रभाव के चलते इन्हीं नीतियों को भारत सहित कई देशों में समाजवादी कहा गया जो निश्चित तौर पर सरकारों की आम जनता के पक्ष में नहीं अपितु पूंजीवादी व्यवस्था के प्रति प्रतिबद्धता का ही परिचायक था।
लेकिन नब्बे के दशक में यह आवरण अब और ज़रूरी नहीं रहा और नयी आर्थिक नीतियों के नाम पर जो नीतियां लागू कीं गईं उनके तहत ग़रीबों तथा वंचितों को दी जाने वाली तमाम सुविधायें धीरे-धीरे छीनी जाने लगीं। पश्चिमी देशों में यह प्रक्रिया पहले ही शुरु हो चुकी थी। उदाहरण के लिये मार्ग्रेट थैचर ले शासनकाल में 1980 में पेंशन निर्धारण के लिये औसत आय का आधार समाप्त कर दिया गया और 1987-88 में बच्चों पर मिलने वाली सुविधायें। इसके परिणाम भी उसी दौर में आने लगे थे – 1979 से 1997 के बीच ब्रिटेन में अमीरों और ग़रीबों के बीच की खाई अभूतपूर्व रूप से बढ गयी। यह दौर एक ध्रुवीय होते जा रहे विश्व में पूंजीवादी समाज की सोच, प्रतिबद्धता और आक्रामकता के नग्नतम रूप में सामने आने का दौर था।
भारत में भी इन नीतियों का प्रसार निश्चित तौर पर सरकारों की बदली प्रतिबद्धताओं का स्पष्ट प्रतिबिंबन था। इनके विस्तार में जाना तो इस लेख की विषयवस्तु के मद्देनज़र विषयांतर होगा लेकिन यह तो स्पष्ट है ही अपने आरंभिक दौर में कुछ तो मुक्ति आंदोलन और नई-नई मिली आज़ादी का हैंगओवर और कुछ देश-दुनिया में ज़ारी आँदोलन का दबाव में पूँजीवादी नीतियों को भी समाजवाद के मुलम्मे में पेश किये जाने का दौर नब्बे के दशक के आरंभ में ही इतिहास बन गया और साठ के दशक में अमेरिका में विकसित रिसाव के सिद्धांत को आधिकारिक तौर पर स्वीकार कर पूरा ज़ोर निजी पूंजी के विकास पर लगाया गया। आय तथा वितरण की असमानता में विस्तार अब कोई चिंता का विषय नहीं रह गया बल्कि इसे संवृद्धि के लिये आवश्यक मान कर स्वीकार किया गया और गरीबों तथा ज़रूरतमंदों की सहायता के लिये दी जाने वाली राशि को संसाधनों की बर्बादी के रूप में निरूपित किया गया। ग़रीबी हटाने जैसे कास्मेटिक नारे भी अब अतीत की बात बन गये। ऐसे में यह अनपेक्षित नहीं था कि पिछले दिनों जब भारत में ग़रीबी रेखा पर बहस के दौरान तमाम अर्थशास्त्रियों ने वास्तविक रूप से गरीबों की संख्या आधिकारिक आकड़ों से कई गुना बताई तो तर्क दिये गये कि अगर ग़रीबी रेखा से नीचे रहने वाले लोगों की संख्या इतनी बढ़ जायेगी तो उनके कल्याण के लिये लागू योजनाओं में धन का अतिरिक्त आवण्टन करना होगा जिसके लिये सरकार के पास पैसा नहीं है (सक्सेना समिति को लिखे गये योजना आयोग के पत्र से)! इसी सरकार के पास पिछले वर्ष पूँजीपतियों को विभिन्न सहायता और छूट के रूप में करोड़ रुपये देने के लिये पर्याप्त धन था!
ग़रीबी रेखा के रूप में ग़रीबी को निर्धारित करने का प्रस्ताव सबसे पहले 1957 में इण्डियन लेबर कांफ्रेंस के दौरान दिया गया था। उसी के बाद योजना आयोग ने एक वर्किंग ग्रुप बनाया था जिसने भारत के लिये आवश्यक कैलोरी उपभोग की अवधारणा पर आधारित ग़रीबी रेखा का प्रस्ताव किया। इसके तहत उस समय बीस रुपये प्रतिमाह को विभाजक रेखा के रूप में स्वीकृत किया गया। 1979 में योजना आयोग ने ही ग़रीबी को पुनर्परिभाषित करने करने के लिये एक टास्क फोर्स का गठन किया गया। लेकिन इसने भी मामूली फेरबदल के साथ मूलतः आवश्यक कैलोरी उपभोग की अवधारणा को ही आधार बनाया। 1973 की क़ीमतों को आधार बनाते हुए इसने ग्रामीण क्षेत्रों के लिये 49 रुपये प्रतिव्यक्ति प्रतिमाह तथा शहरी क्षेत्रों के लिये 57 रुपये की विभाजक रेखा तय की। मुद्रास्फीति के अनुसार इसमें समय-समय पर समायोजन किया गया और वर्तमान में यह शहरी क्षेत्रों के लिये 559 रुपये और गाँवों के लिये 368 रुपये है। योजना आयोग गरीबी रेखा के निर्धारण के लिये राष्ट्रीय तथा राज्य स्तर पर एन एस एस ओ के उपभोक्ता व्यय सर्वेक्षणों के आधार पर विभाजक रेखा तय करता है। 2004-2005 के लिये प्रोफेसर लकड़वाला की अध्यक्षता में 1997 में बने एक्स्पर्ट ग्रुप द्वारा की गयी अनुशंसा के आधार पर जो आंकड़े निकाले गये थे उनके अनुसार देश में उस समय ग़रीबों की कुल संख्या 28।3 प्रतिशत थी।
सेन्टर फार पालिसी आल्टरनेटिव की एक रिपोर्ट में मोहन गुरुस्वामी और रोनाल्ड जोसेफ़ एब्राहम इस ग़रीबी रेखा को भूखमरी रेखा कहते हैं। कारण साफ़ है। इसके निर्धारण का इकलौता आधार आवश्यक कैलोरी उपभोग है। यानि इसके अनुसार वह आदमी गरीब नहीं है जो येन के प्रकारेण दो जून अपना पेट भर ले और अगले दिन काम करने के लिये ज़िन्दा रहे। युनिसेफ़ स्वस्थ शरीर के लिये प्रोटीन, वसा, लवण, लौह और विटामिन जैसे तमाम अन्य तत्वों को ज़रूरी बताता है जिसके अभाव में मनुष्य कुपोषित रह जाता है तथा उसकी बौद्धिक व शारीरिक क्षमतायें प्रभावित होती हैं। लेकिन ग़रीबी रेखा तो केवल ज़िन्दा रहने के लिये ज़रूरी भोजन से आगे नहीं बढ़ती। इसके अलावा शायद व्यवस्था यह मानकर चलती है कि आबादी के इस हिस्से का स्वास्थ्य, शिक्षा, मनोरंजन, घर, साफ़ पानी, सैनिटेशन जैसी तमाम मूलभूत सुविधाओं पर तो कोई हक़ नहीं है। वैसे तो जिस आवश्यक कैलोरी उपभोग की बात की जाती है ( शहरों में 2100 तथा गांवों में 2400 कैलोरी प्रतिव्यक्ति प्रतिदिन) वह भी दिन भर शारीरिक श्रम करने वालों के लिहाज़ से अपर्याप्त है। इण्डियन काउंसिल आफ़ मेडिकल रिसर्च के अनुसार भारी काम में लगे हुए पुरुषों को 3800 कैलोरी तथा महिलाओं को प्रतिदिन 2925 कैलोरी की आवश्यकता है। यही नहीं, अनाज़ों की क़ीमतों में तुलनात्मक वृद्धि व उपलब्धता में कमी, स्वास्थ्य तथा शिक्षा जैसे क्षेत्रों में सरकार की घटती भागीदारी, विस्थापन तथा तमाम ऐसी ही दूसरी परिघटनाओं की रोशनी में यह रेखा आर्थिक स्थिति के आधार पर समाज को जिन दो हिस्सों में बांटती है उसमें ऊपरी हिस्से के निचले आधारों में एक बहुत बड़ी आबादी भयावह ग़रीबी और वंचना का जीवन जीने के लिये मज़बूर है और तमाम सरकारी योजनायें उसको लाभार्थियों की श्रेणी से उसके आधिकारिक तौर पर ग़रीब न होने के कारण बाहर कर देती है।
इसी वज़ह से भारत सरकार के ग़रीबी के आधिकारिक आंकड़े हमेशा से विवाद में रहे हैं। विभिन्न अंतर्राष्ट्रीय तथा दूसरी स्वतंत्र संस्थाओं के अध्ययनों में देश में वास्तविक ग़रीबों की संख्या के आंकड़े सरकारी आंकड़ों से कहीं ज़्यादा रहे हैं। अभी हाल ही में विश्व बैंक की ग्लोबल इकोनामिक प्रास्पेक्ट्स फार 2009 नाम से ज़ारी रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया है कि 2015 में भारत की एक तिहाई आबादी बेहद ग़रीबी ( 1।25 डालर यानि लगभग 60 रुपये प्रतिदिन प्रतिव्यक्ति से भी कम आय) में गुज़ारा कर रहे हैं। इस रिपोर्ट के अनुसार यह स्थिति सब सहारा देशों को छोड़कर पूरी दुनिया में सबसे बद्तर होगी। यही नहीं, यह रिपोर्ट भारत की तुलनात्मक स्थिति के लगातार बद्तर होते जाने की ओर भी इशारा करती है। इसके अनुसार जहां 1990 में भारत की स्थिति चीन से बेहतर थी वहीं 2005 में जहां चीन में ग़रीबों का प्रतिशत 15।9 रह गया, भारत में यह बढ़कर 41।6 हो गया।
इन्हीं विसंगतियों के मद्देनज़र पिछले दिनों सरकार ने ग़रीबी रेखा के पुनर्निर्धारण के लिये जो नयी क़वायदें शुरु कीं उन्होंने इस ज़िन्न को बोतल से बाहर निकाल दिया है। सबसे पहले आई असंगठित क्षेत्र के उद्यमों के लिये गठित राष्ट्रीय आयोग (अर्जुन सेनगुप्ता समिति) की रिपोर्ट ने देश में तहलका ही मचा दिया था। इसके अनुसार देश की 77 फीसदी आबादी 20 रुपये रोज़ से कम में गुज़ारा करती है। दो अंको वाली संवृद्धि दर और शाईनिंग इण्डिया के दौर में यह आंकड़ा सच्चाई के घिनौने चेहरे से नक़ाब खींचकर उतार देने वाला था। समिति ने असंगठित क्षेत्र के लिये दी जाने वाली सुविधायें इस आबादी तक पहुंचाने की सिफ़ारिश की थी। लेकिन बात यहीं पर ख़त्म नहीं हुई। भारत सरकार द्वारा ग़रीबी रेखा के निर्धारण के लिये मानक तैयार करने के लिये ग्रामीण विकास मंत्रालय के पूर्व सचिव श्री एन के सक्सेना की अध्यक्षता में जो समिति बनाई थी उसके आंकड़े और भी चौंकाने वाले थे। इस समिति ने अगस्त-2009 में पेश अपनी रिपोर्ट में ग़रीबी रेखा से ऊपर रहने वालों के विभाजन के लिये पांच मानक सुझाये। जिसमें शहरी क्षेत्रों में न्यूनतम 1000 रुपये तथा ग्रामीण क्षेत्रों में न्यूनतम 700 रुपयों का उपभोग या पक्के घर या दो पहिया वाहन या मशीनीकृत कृषि उपकरणों जैसे ट्रैक्टर या ज़िले की औसत प्रतिव्यक्ति भू संपति का स्वामित्व। इस आधार पर समिति पर गरीबी रेखा के निर्धारण पर समिति ने पाया कि भारत की ग्रामीण जनसंख्या का कम से कम पचास फ़ीसदी इसके नीचे जीवनयापन कर रहा है। सक्सेना समिति ने खाद्य मंत्रालय के आंकड़ों का भी ज़िक्र किया है जिसके अनुसार गांवों में 10।5 करोड़ बीपीएल राशन कार्ड हैं। अगर इसी को आधार बनाया जाय तो भी गांवों में ग़रीबी रेखा से नीचे रह रहे लोगों की संख्या लगभग 53 करोड़ ठहरती है जो कुल आबादी का लगभग पचास फ़ीसदी है।
समिति का यह भी मानना कि जहां आधिकारिक तौर पर 1973-74 से 2004-05 के बीच ग़रीबी 56 प्रतिशत से घटकर 28 प्रतिशत हो गयी वहीं ग़रीबों की वास्तविक संख्या में कोई कमी नहीं आयी। अपने निष्कर्ष में वह कहते हैं कि ग़रीब परिवारों की एक बहुत बड़ी संख्या ग़रीबी उन्मूलन के कार्यक्रमों से बहिष्कृत रही है और ये निश्चित रूप से सुदूर क्षेत्रों में रहने वाले बेज़ुबान लोग ही होंगे।
लेकिन सरकार ने इस समिति की अनुशंसाओं को लागू करने से साफ़ इंकार कर दिया। योजना आयोग द्वारा समिति को लिखे गये पत्र का ज़िक्र पहले ही किया जा चुका है। ग्रामीण विकास मंत्री श्री सी पी जोशी ने इस पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा था कि सक्सेना समिति को ग़रीबों की गणना करने के लिये नहीं सिर्फ़ ग़रीबों की पहचान करने के लिये नयी प्रणाली विकसित करने के लिये कहा गया था।
इस दौरान योजना आयोग के एक सदस्य अभिजीत सेन ने तर्क दिया था कि ग़रीबों की गणना आवश्यक कैलोरी उपभोग की जगह आय के आधार की जानी जानी चाहिये। उनका यह भी मानना था कि मौज़ूदा मानकों के आधार पर गणना से शहरी क्षेत्रों में ग़रीबों की वास्तविक संख्या 64 फ़ीसदी तथा गांवों में अस्सी फ़ीसदी है।
इस संदर्भ में केन्द्र सरकार द्वारा प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार समिति के तत्कालीन अध्यक्ष सुरेश तेंदुलकर समिति को ग़रीबों की संख्या की गणना की ज़िम्मेदारी दी गयी थी। इस आयोग की पिछले महीनें प्रस्तुत समिति की रिपोर्ट एक तरफ़ तो आवश्यक कैलोरी उपभोग वाली परिभाषा से आगे बढ़ने की कोशिश करती है तो दूसरी तरफ़ आंकड़ों में ग़रीबी कम रखने का दबाव भी इस पर साफ़ दिखाई देता है।
तेंदुलकर समिति के अनुसार 2004-05 में भारत की कुल आबादी का 37 2 फीसदी हिस्सा ग़रीबी रेखा के नीचे है। यह आंकड़ा योजना आयोग के 27 5 फीसदी से तो अधिक है लेकिन अभिजित सेन कमेटी या ऐसे अन्य अध्ययनों के निष्कर्षों से कम। हालांकि योजना आयोग से इसकी सीधी तुलना मानकों के परिवर्तन के कारण संभव नहीं है। आयोग के अनुसार बिहार तथा उड़ीसा में ग्रामीण ग़रीबी का प्रतिशत क्रमशः 55 7 तथा 60 8 है, उल्लेखनीय है कि सेन कमेटी के अनुसार इन दोनों प्रदेशों में ग्रामीण ग़रीबी का प्रतिशत 80 से अधिक था। आयोग ने ग्रामीण क्षेत्रों में ग़रीबी निर्धारण के लिये सीमारेखा 356 30 से बढ़ाकर 444 68 रुपये और शहरी क्षेत्रों में 538 60 रुपये से बढ़ाकर 578 80 की है। इस आधार पर दैनिक उपभोग की राशि शहरों में लगभग 19 रुपये और गांवों में लगभग 15 रुपये ठहरती है जो विश्वबैंक द्वारा तय की गयी अंतर्राष्ट्रीय ग़रीबी रेखा (20 रुपये) से कम है।
समिति ने आवश्यक कैलोरी वाले मानक को पूरी तरह समाप्त कर दिया है। इसकी जगह पर समिति का ज़ोर शिक्षा, स्वास्थ्य तथा अन्य क्षेत्रों में होने वाले ख़र्चों को भोजन के साथ समायोजित कर ग्रामीण तथा शहरी विभाजन को समाप्त कर क्रय शक्ति समानता पर आधारित एक अखिल भारतीय ग़रीबी रेखा के निर्धारण पर है। यह अवधारणा के रूप में 1973-74 वाले मानकों से निश्चित रूप से बेहतर हैं जिसमें शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी तमाम ज़रूरतों को सरकार द्वारा मुफ़्त उपलब्ध कराये जाने की मान्यता पर आधारित थे। लेकिन आवश्यक कैलोरी उपभोग वाली अवधारणा को पूरी तरह से ख़त्म किया जाना, ख़ासतौर से तब जबकि पिछले दिनों अंतर्राष्ट्रीय खाद्य नीति अनुसंधान के अंतर्राष्ट्रीय भूख सूचकांक में भारत को 66 वें पायदान पर रखा गया है, और खाद्यान्न संकट, खाद्यान्नों की क़ीमतों में अभूतपूर्व तेज़ी तथा कुपोषण की समस्या लगातार गहराती गयी है, इसकी नीयत पर सवाल उठाता ही है। इस दौर में पेश की गयी इस अवधारणा का अर्थ होगा कि ग़रीबी रेखा से वास्तविक ग़रीबों का बहुलांश बाहर रह जायेगा। यहां पर यह भी बता देना आवश्यक है कि कई हालिया अध्ययन बताते हैं कि सबसे ग़रीब दस फ़ीसदी लोगों का कैलोरी उपभोग सबसे अमीर दस फ़ीसदी लोगों के कैलोरी उपभोग से कम है जबकि यह तो सर्वज्ञात तथ्य है कि जहां अमीर आदमी तमाम दूसरी पोषक चीज़ों का उपभोग करता है वहीं ग़रीबों का वह तबका अपनी लगभग पूरी आय भोजन पर ही ख़र्च करता है।
दरअसल मानकों के न्यायपूर्ण निर्धारण के लिये जहां एक तरफ़ आवश्यक कैलोरी उपभोग की अवधारणा को इण्डियन काउंसिल आफ़ मेडिकल रिसर्च की पूर्व में उद्धृत अनुशंसा के आधार पर और ऊंचे स्तर पर ले जाते हुए इसमें पोषण के लिये आवश्यक अन्य तत्वों के साथ समायोजित किया जाना चाहिये था और इसके साथ एक सम्मानजनक जीवनस्तर के लिये आवश्यक शिक्षा, स्वास्थ्य, मनोरंजन, घर, पीने का साफ़ पानी, सैनिटेशन जैसी तमाम चीज़ों से जोड़कर देखा जाना चाहिये था। इस संदर्भ में सेंटर फार आल्टरनेटिव पालिसी रिसर्च द्वारा मूलभूत आवश्यकताओं की क़ीमत पर आधारित ग़रीबी की विभाजक रेखा ज़्यादा न्यायपूर्ण लगती है जिसमें 2004-2005 के लिये अखिल भारतीय स्तर पर 840 रुपये प्रतिव्यक्ति प्रतिमाह का निर्धारण किया गया है ( विस्तार के लिये देखें (http://www.time.com/time/magazine/article/0,9171,953457,00 html#ix220×0pDZXVJ ) । इसके साथ ही एन के सक्सेना द्वारा सुझाये गये मानक भी सच के ज़्यादा करीब हैं।
साथ ही तेंदुलकर समिति ग़रीबी निर्धारण के आधारों में विस्तार के दावे के बावज़ूद ग़रीबी की बहुआयामी प्रकृति के बारे में कोई पहल नहीं करती। पहले की तमाम रिपोर्टों की तरह यह भी ग़रीबी को महज़ आर्थिक समस्या की तरह निरूपित करती है। इसके सामाजिक-सांस्कृतिक आयामों को समझे बिना इसे जड़मूल से समाप्त किया ही नहीं जा सकता। जाति, लिंग, शारीरिक अक्षमता, क्षेत्रीय असंतुलन जैसे तमाम कारक भारत में ग़रीबी को निर्धारित करते हैं।
दरअसल वस्तुस्थिति यह है कि ग़रीबी के इन तकनीकी निर्धारणों के मूल में उस बड़ी हक़ीक़त पर परदा डालना है कि इन सब क़वायदों के मूल में भयावह तरीके से विस्तारित होती आर्थिक असमानता की खाई के सवाल को दबाये रखना है। नई आर्थिक नीतियों से लाभान्वित होने वाले छोटे से तबके के प्रति अपनी स्पष्ट प्रतिबद्धता और सामाजार्थिक समानता के उद्देश्य को पूर्ण तिलांजलि दे चुकीं शासन व्यवस्थाओं के लिये ग़रीबी उन्मूलन की योजनायें एक तरफ़ तो जनाक्रोशों को दबाये रखने वाले सेफ़्टी वाल्व हैं तो दूसरी तरफ़ हर पांच साल पर होने वाले चुनावों के मद्देनज़र एक आवश्यक फ़िज़ूलखर्ची। शायद लोकतंत्र के तहत हर पांच साल पर जनता के बीच जाने की मज़बूरी ही वह वज़ह है कि धनकुबेरों के प्रति अपने स्पष्ट झुकाव के बावज़ूद सरकारें ग़रीबों के नाम पर थोड़ा-बहुत ख़र्च करती हैं – लेकिन जहां अमीरों को सुविधायें हक़ की तरह दी जाती हैं वहीं वंचितों को ख़ैरात की तरह। ऐसे में यह स्वाभाविक ही है कि ग़रीबी को एक असमाधेय समस्या के रूप में निरूपित कर नरेगा जैसी कुछेक योजनाओं द्वारा थोड़ा-बहुत लाभ एक सीमित आबादी तक पहुंचाया जाता है लेकिन भूमि सुधार, आय तथा व्यय पर करों द्वारा नियंत्रण तथा पुनर्वितरण जैसे बड़े और समस्या के जड़ पर प्रहार करने वाले उपाय सरकारों की कार्यसूची में शामिल ही नहीं होते। इस नई क़वायद के पीछे भी येन केन प्रकारेण आधिकारिक रूप से ग़रीबों की संख्या को न्यूनतम स्तर पर रखना है जिससे कि प्रस्तावित राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा क़ानून में सब्सीडियों पर नियंत्रण रखा जा सके। खाद्य एवं लोक वितरण मंत्रालय द्वारा राज्य सरकारों को प्रेषित इस क़ानून के अवधारणा पत्र में साफ़ किया गया है कि ग़रीबी रेखा के नीचे रहने वालों की संख्या के निर्धारण का अधिकार अनन्य रूप से केन्द्र सरकारों के पास ही रहेगा। राज्य सरकारों को टारगेटेड बीपीएल के अंतर्गत लाभान्वित होने वाले परिवारों की संख्या पर नियंत्रण रखने की ताक़ीद की गयी है। यह क़ानून इस सूची की सालाना समीक्षा को आवश्यक बना देगा। अपनी ड्राफ़्ट गाइडलाइन में यह पहले ही चेता चुका था कि अगर राज्य सरकारों पर बीपीएल सूची बनाने का काम छोड़ दिया गया तो भारत में ग़रीबी रेखा से नीचे रहने वालों की संख्या कुल ग्रामीण आबादी की 80-85 फ़ीसदी तक हो जाने की आशंका है। साफ़ है कि ऐसी नीयत के साथ बनने वाले खाद्य सुरक्षा क़ानून का हश्र भी कुछ दिनों पहले बने शिक्षा के अधिकार क़ानून जैसा ही होना है।
ग़रीबी रेखा के रूप में आय या आवश्यक कैलोरी उपभोग के किसी एक ख़ास आंकड़े को विभाजक बना देना रोज़ बदलती क़ीमतों और रोज़गार की अनिश्चितता की रोशनी में दरअसल एक भद्दा मज़ाक है। जब दाल 90 रुपये, चावल 20 रुपये, आटा 17 रुपये किलो बिक रहा है, डाक्टरों की फीस आसमान छू रही है, दवायें इतनी मंहगी हैं और बसों तथा रेलों से कार्यस्थल तक पहुंचने में ही 10-15 रुपये ख़र्च हो जाते हैं तो दिल्ली में बैठकर यह तय करना कि 15 या 20 रुपये रोज़ में एक आदमी अपना ख़र्च चला सकता है और उससे अधिक पाने वालों को सहायता देने की कोई ज़रूरत नहीं है उस सरकार की प्रतिबद्धता को स्पष्ट कर देता है जो पिछले साल पिछले बज़ट में पूंजीपतियों को सहायता और करों में छूट के रूप में 4,18,095 करोड़ रुपयों की सौगात दे चुकी है। सरकार की पक्षधरता तो तभी स्पष्ट हो गयी थी जब मंदी से निपटने के नाम पर तो बेल आऊट पैकेज़ों के नाम पर अकूत राशि बांटी गयी लेकिन जिन लोगों ने अपने रोज़गार गंवाये या जिनकी तनख़्वाहों में कटौतियां की गयीं उन लोगों की सुरक्षा या इस संकट से उनके बेल आऊट के लिये कोई कदम उठाने की ज़रूरत महसूस नहीं की गयी। जनता के पक्ष में खड़ी एक सच्ची समाजवादी सरकार ऐसी स्थितियों में ग़रीबी के आंकड़ों पर नियंत्रण की जगह उन मूलभूत कारणों की जड़ों पर प्रहार करने की कोशिश करती जिनकी वज़ह से अर्थव्यवस्था में विषमता की ऐसी भयावह फांक पैदा होती है। वह प्रयास करती कि विलासिता की वस्तुओं के उत्पादन में हो रहे संसाधनों के अपव्यय पर रोक लगा उन्हें अनाज़, शिक्षा, दवाओं और आम जन के उपभोग की ऐसी ही तमाम दूसरी चीज़ों के उत्पादन की तरफ़ मोड़कर जनता को इन्हें सस्ती क़ीमतों पर उपलब्ध कराया जाय। वह शिक्षा को बाज़ार के हाथों सौंपकर आम जन से दूर कर देने की जगह क्यूबा की तरह डाक्टरों की ऐसी फ़ौज़ पैदा करती जो न सिर्फ़ अपने देश बल्कि दुनिया भर के ग़रीब देशों में सस्ती और स्तरीय चिकित्सा उपलब्ध कराते। लेकिन भयावह ठंढ में कपड़ों में आग लगाकर पूर्ति को नियंत्रित करने वाली ( देखें पार्टी फॉर सोशलिज्म एण्ड लिबरेशन की वेबसाइट) वालमार्ट जैसी कंपनियों के स्वागत को बाहें पसारे लोग ऐसा सोच भी कैसे सकते हैं?
अशोक कुमार पाण्डेय

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