’वर्गहीन कला एक ढोंग है’–ऋत्विक घटक
(मशहूर फ़िल्म आलोचक कल्पना विश्वास द्वारा लिया गया इंटरव्यू)
1. जनाब घटक, फ़िल्मों में आने की प्रेरणा आपको कंहा से मिली?
उत्तर- आप कह सकते है की टॆढे- मेढे रास्ते से मैं फ़िल्मों तक पहुंच गया. अगर मेरे पिता का बस चलता तो मैं इन्कम टैक्स आफ़िसर होता. मुझे नौकरी मिल गई थी मगर कम्युनिस्ट पार्टी में शामिल होने के लिये मैंने उसे छोड दिया. अगर मैं वो नौकरी करता तो शायद मैं आज कमिश्नर या अकाउन्टैंट जनरल होता. पर आज मैं महज एक गली का कुत्ता हूं.
नौकरी छोड्ने के बाद मैंने कविता लिखने की कोशिश की मगर इसमें अपने आपको पूर्णतः असमर्थ पाया. मैंने अपना शौक छोटी कहानियों की तरफ़ मोड दिया और थोडा बहुत नाम कमाया. इनमें से सौ से अधिक कहानियां देश , परिचय , शनिबारेर चिट्ठी आदि बंगाल की अग्रणी पत्रिकाओं में छ्पी. तब मैंने जाना कि साहित्य मनुष्य की आत्मा में गहरे पैठता है. मगर ये धीमे काम करता है. भीतर अपनी जडे जमानें में काफ़ी वक्त लेता है. किशोरावस्था के ठेठ उतावलेपन में मैं जल्द और फ़ौरी असर डालना चाहता था. मै जनता को तुरंत जगाने की जरुरत महसूस करता था.
फ़िर एक चमत्कार हुआ – इप्टा ( भारतीय गण नाट्य़ संघ). सबसे पहले आया ’जबानबंदी’ (१९४३) और फ़िर बिजन भट्टाचार्या का ’धमाका नबान्नो’ (१९४४). इन्होंने मुझे दर्शाया की स्वतः स्फ़ूर्त सम्प्रेषण के लिये थियेटर साहित्य से कहीं अधिक प्रभावी है. मैंने कहानियां लिखना छोड दिया और नाटक लिखने और नाटक मंडलियों को संगठित करने में लग गया. जब मैंने रवीन्द्रनाथ ठाकुर के नाटक बिसर्जन का मंचन किया तो उसे आठ हजार से ज्यादा लोगो ने देखा. ये अदभुत था. पर तब मैंने जाना की इतना अधिक सामूहिक श्रम इतने भर के लिये? तब मैने फ़िल्म बनाना तय किया.
2. क्या फ़िल्म माध्यम के जरिये आप अपनी इच्छा पूरी कर पाय?
उत्तर- बीते समय पर एक नजर डालू तो कह सकता हूं कि फ़िल्म माध्यम से मेरा कोई विशेष लगाव नहीं है. मैं केवल अपने आसपास के यथार्थ को लोगो तक पहुचाना चाहता हूं. मैं चिल्लाना चाहता हूं. सिनेमा मुझे उसके लिये आदर्श माध्यम लगता है. और ये अरबों- खरबों तक पहुंच सकती है. मैं फ़िल्में फ़िल्म माध्यम के लिये नहीं अपने लोगो के लिये बनाता हूं. कल टेलीविजन लाखों लोगो तक पहुचेगा तो मैं सिनेमा को छोडकर टेलीविजन की तरफ़ रुख करुंगा.
3. क्या आप किसी विशेष असर से फ़िल्मकार बनने के लिये प्रेरित हुए?
उत्तर- हा! कई फ़िल्में थी जैसे आईजेनस्टाइन की बैटलशीप पोतेमकिन, पुदोवकिन की मदर, चेकोस्लवाक फ़िल्म क्राकातित, ओटाकर ववरा की नीम बरिकदा और कई फ़िल्में थी. आईजेनस्टाइन की ही फ़िल्म सेंस और फ़ार्म, पुदोवकिन की फ़िल्म टेकनिक और एक्टिंग, आइवर मांटेगु का पेंगविन द्वारा निकाला गया फ़िल्म पर लेखों का संग्रह और बेला बालास्ज का थ्योरी ओफ़ द फ़िल्म, इन सब ने मेरे सामने एक नई दुनिया खोलकर रख दी.
ज्यादातर फ़िल्में जिनके नाम मैंने ऊपर लिये , उस समय वो हिन्दुस्तान में प्रतिबंधित थी. हम उन्हें चोरी-छिपे ही देखते थे. इन सब ने हमारे तमाम अनुभव में एक रोमांच भर दिया.
4. जिन लोगो का आपने जिक्र किया, क्या आप के मत में वो महानतम फ़िल्मकारों में से एक है?
उत्तर- वे न तो दंभी है और न ही उथले कलाप्रेमी. कमोबेश वो इस उतेजक माध्यम का अन्वेषण करने वाले अगुआ हैं. आईजेनस्टाइन, पुदोवकिन और दोवजेंकों ने फ़िल्मों की एक नई कलात्मक भाषा को खोजा. वे पहले फ़िल्मकार ही नहीं थे साथ ही प्रथम फ़िल्म विचारकों में ही थे. कहीं के भी फ़िल्म बनाने वाले को इन्होने अभिव्यक्ति के लिये एक पूरा नया माध्यम दिया.
5. आप भारतीय फ़िल्मकारों के काम से तो वाकिफ़ है हमारी फ़िल्मों को कलात्मक नजर से कैसे आंकते है?
उत्तर- मैं बहुत खराब सिनेमा दर्शक हूं. फ़िर भी जितना कुछ मैंने देखा है, मैं उससे यही कहूंगा की बांग्ला सिनेमा का विकास रुक गया है. हमारे नये फ़िल्मकार भावुकता के आसुओं और भद्दे ओपेरा के दलदल में मस्त है. पर बंबई समेत भारत के अन्य हिस्सों में फ़िल्मकारों की एक नई पीढी सम्भावनाएं जगा रही है. बंबई में श्याम बेनेगल, कुमार शाहानी और मणि कौल. सत्यदेव दुबे पुणे मॆं , सथ्यू कर्नाटक में और जोन अब्राहम केरल में, ये सहज ही मेरे ध्यान में आते है. बंगाल में भी एक आन्दोलन है पर व्यावसायिकता इसका दम घोंट रही है.
6. आठ फ़िचर फ़िल्मों और दस से भी ज्यादा फ़िल्में आपने बनाई है. इनमें से कौन सी से आप खुद सन्तुष्ट रहे है और क्यों?
उत्तर- इसका जवाब देना मुश्किल है पर आज तक मेरी चार फ़िल्मों से ज्यादा सन्तुष्टि मिली है. ’अजांत्रिक’ क्योंकि इसमें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता थी और तकनीकी उपलब्धियां.इसमें कोई गीत नहीं था. ’सुबर्णरेखा’ जो मेरी सबसे अधिक दार्शनिक फ़िल्म है. ’तिताश एकटि नदीर नाम’ जो की ग्रामीण बांग्ला की एक काव्यात्मक कहानी है.खासकर उसके मानसुन और इसमें मैंने कुछ जोरदार मजदूर वर्गीय चरित्रों को उभारा है जो ठेठ बंगाली है.अभी मेरे पास बंगाल की लोककथा पर फ़िल्म बना रहा हूं जिसमें मैंने सवादों का परित्याग कर २५ गीतों और कई कविताओं का इस्तेमाल किया है. दूसरे छोर पर मैंने एक स्क्रिप्ट लिखी है जिसमें न तो गीत है न संवाद. केवल विरुपित शोर है और पाश्र्व संगीत है ! ये महाराष्ट्र के कोली कबीले की एक गूंगी –बहरी लड्की की कहानी है जिसे फ़िल्माने मैं बंबई जा रहा हूं.
7. आप ये मानते है की दर्शकों के मनोरंजन के लिये या अपना मुनाफ़े के लिये फ़िल्म बनाना गंदा काम है. क्या आप का मानना है कि इस ताकतवर मास मीडिया का इस्तेमाल सुधारवादी प्रोपेगैंडा और सक्रिय प्रचार के लिये किया जाना चाहिये. जैसा हमारे चंद बेहतरीन फ़िल्मकारों ने अक्सर कला की एवज में किया है?
उत्तर- मैं इस विषय में पुरानपंथी हूं. रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने कहा था की कला को खूबसूरत होना चाहिये. मगर उससे पहले भी कला को सच्चा होना चाहिये.अब सवाल है की सच क्या है. कोई शाश्वत सच नहीं है. हर कलाकार को एक दर्द भरी निजी प्रक्रिया से गुजरकर अपने निजी सत्य को जानना होता है. यही उसे सम्प्रेषित करना होता है. दुनिया में अभी तक कोई वर्ग-विहीन कला नहीं है क्योंकि वर्ग विहीन समाज नहीं है. हर सच्ची कला को मानव की बेहतरी के लिये काम करना है. मैं किसी अपरिवर्तनीय अवधारणा में विश्वास नहीं रखता. लेकिन साथ ही मुझॆ आश्चर्य होता है उन तथाकथित महान फ़िल्मकारों पर जो मूलतः उथले कलाप्रेमियों के अलावा कुछ नहीं है. जो मानव संबंधों की कला का राग अलापते है. ये अपने सामाजिक दायित्व से मुंह मोडने का एक चालाक तरीका है. वो जो करते है वो महज उनकी व्यवस्था के हित साधता है. ऎसे नारों से मुझे घिन आती है.

प्रेरक इंटर्व्यू .