रिश्ते : दो स्थितियाँ

(1)

रूठें कैसे नहीं बचे अब
मान मनोव्वल के रिश्ते
अलगे-से चुपचाप चल रहे
ये पल दो पल के रिश्ते .

कभी गाँठ से बंध जाते हैं
कभी गाँठ बन जाते हैं
कब छाया कब चीरहरण, हो
जाते आँचल के रिश्ते

आते हैं सूरज बन, सूने
में चह-चह भर जाते हैं
आँज अँधेरा भरते आँखें
छल-छल ये छल के रिश्ते

कच्चे धागों के बंधन तो
जनम-जनम पक्के निकले
बड़ी रीतियाँ जुगत रचाईं
टूटे साँकल के रिश्ते

एक सफेदी की चादर ने
सारे रंगों को निगला
आज अमंगल और अपशकुन
कल के मंगल के रिश्ते

(2)

रँगी परातों से चिह्नित कर
चलते पायल-से रिश्ते
हँसी -ठिठोली की अनुगूँजें
भरते, कलकल-से रिश्ते

पसली के अंतिम कोने तक
कभी कहकहे भर देते
दिन-रातों की आँख-मिचौनी
हैं ये चंचल-से रिश्ते

उमस घुटन की वेला आती
धरती जब अकुलाती है
घन-अंजन आँखों से चुपचुप
बरसें बादल -से रिश्ते

पलकों में भर देने वाली
उंगली पर रह जाते हैं
बैठ अलक काली नजरों का
जल हैं, काजल-से रिश्ते

कभी तोड़ देते अपनापन
कभी लिपट कर रोते हैं
कभी पकड़ से दूर सरकते
जाते, पागल -से रिश्ते

dr_kavita_vachaknaveeडॉ॰ कविता वाचक्नवी

3 Comments

  1. mich says:

    बहुत खुबसुरत भाव और विचार है.

  2. आभारी हूँ , आखर और Mich आप दोनों की|

    @ आखर –
    कृपया चित्र के साथ लगाया गया मेरा ईमेल आई डी हटा दें, इस से स्पैम आने का ख़तरा बहुत बढ़ गया है |

  3. pran sharma says:

    Dr.KAVITA VACHAKNAVEE KEE DONO KAVITAYEN ACHCHHEE LAGEE HAIN.PANKTIYON MEIN KAHIN

    GEET KEE GARIMAA HAI AUR KAHIN GAZAL KEE NAAZUKI .AESE KAVITAAYEN MAINE BAHUT KAM

    PADHEE HAIN JINMEIN GEET AUR GAZAL KAA SANGAM HO.BHASHA AUR SHILP KHOOB HAI !

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