शशि पाधा की दो कविताएं
कुछ पल
दूर कहीं कोई छेड़े साज
अन्तर्मन के खोल झरोखे
मैं भी कुछ पल जी लूं आज ।
ओस कणों के पहनूं गहने
अरुणाई से मांग भरूं
लौट न आयें नयनन बदरा
अधरों से कोई गीत बुनूं
इन्द्र धनु की सतरंग लड़ियां
मन अंगना में बांधूं आज
वीणा की तारों से पूछूं
भूल गई क्यों जीवन राग
अम्बर मेघा घिर-घिर आए
मन ही मन मैं गाऊं फाग
बादल की नैया पे बैठूं
तारों के संग हंस लूं आज
ओढ़ चांदनी की चूनर मैं
सीपी में इक रात बिताऊँ
बन्द करूं यह प्रहरी नयना
सारी दुनिया से छिप जाऊँ
बांध न पाए कोई बंधन
ऐसी रीत बना लूं आज ।
कैसे जी भर जी लूं आज !!!!
—————————————————————–
बस यूं ही मैंने
बस यूं ही मैंने पूछा था
जीवन पथ पर चलते चलते
धूप छाँव से केलि करते
टूटेंगे जब सम्बल सारे
बन पाओगे सबल सहारे ?
बस यूं ही मैंने पूछा था—
वीणा की तारों को छेड़ूँ
छेड़ न पाऊँ राग कभी जब
छू कर मेरे होठों को तब
गा पाओगे गान वही तुम ?
यूं ही मैंने पूछ लिया था–
सागर के मँझधार हो नैया
खो जाये पतवार कभी तो
बाँध के बाहों के घेरे में
ले जाओगे पार कभी तुम?
बस यूं ही मैंने पूछ लिया था—
बिखरे सपनों की घड़ियों में
टूटे मन की आस कभी तो
अवसादों के लाँघ के पहरे
दे दोगे विश्वास कभी तुम?
और मेरे कांधे को छू कर
तुम जो थोड़ा मुसकाए थे
मौन तेरे अधरों पे मैंने
सारे उत्तर पढ़ डाले थे।
जाने क्यों मैंने पूछ लिया था !!
email–shashipadha@gmail.com


bahut khubsurat bhav aur vichar.kavitri ko badhi.
दूर कहीं कोई छेड़े साज
अन्तर्मन के खोल झरोखे
मैं भी कुछ पल जी लूं आज ।……. क्या बात कहीं आपने. मेरी शुभकामनायें
जीवन के इन भावों को सम्भाल कर रखना जरुरी है. ताकी हम इन्हें तन्हाई में याद कर सके. सुन्दर कविताओं के लिये ‘आखर’ और लेखिका का शुक्रिया.
आपाधापी के इस युग में निरंतर जहाँ वक्त रेत की तरह हमरे हाथों से फिसलता जा रहा है वहीँ दो पल इस साहित्य के मोड़ पर रुकर शशि पाधा जी की इस संगीतमय सुर ताल में शब्द बढ़ रचना का आनंद बहुत ही अनुकूल लगा…बहुत ही पाकीज़ जज़बा भरा है शशि जी
बस यूं ही मैंने पूछा था—
वीणा की तारों को छेड़ूँ
छेड़ न पाऊँ राग कभी जब
छू कर मेरे होठों को तब
गा पाओगे गान वही तुम ?
बधाई हो
देवी नागरानी
जीवन के इतने अहम भाव , कितनी सरलता और सुकोमलता से कह दिए हॅ।बहुत ही खूबसूरत
सागर के मँझधार हो नैया
खो जाये पतवार कभी तो
बाँध के बाहों के घेरे में
ले जाओगे पार कभी तुम?
मौन तेरे अधरों पे मैंने
सारे उत्तर पढ़ डाले थे।
बहुत बहुत बधाई हो | मेरी शुभकामनायें ।
डा . सरिता मेह्ता
शशि जी की दोनों कविताएँ हृदय को बांधती चली गई हैं-
और मेरे कांधे को छू कर
तुम जो थोड़ा मुसकाए थे
मौन तेरे अधरों पे मैंने
सारे उत्तर पढ़ डाले थे।
और
ओढ़ चांदनी की चूनर मैं
सीपी में इक रात बिताऊँ
बन्द करूं यह प्रहरी नयना
सारी दुनिया से छिप जाऊँ
इतनी सुन्दर अभिव्यक्ति क्या कहूँ..
शब्द शशि जी की कल्पना का इंतज़ार कर रहे होते हैं,
कलम तो बहाना बनती है..
शशि जी , बेहद भावभीनी कविताएँ हैं आपकी। अतिसुन्दर……………!!!!! मैं तो इनमें ऐसी डूबी कि अभी भी उनमें भरी संवेदनाओं से बाहर नहीं आ पाई हूँ। क्या खूब लिखा है आपने । ढेर सारी शुभकामनाओं के साथ………
— दीप्ति
Buy:Wellbutrin SR.Ventolin.Prozac.Female Cialis.Acomplia.Aricept.Advair.Lipitor.Nymphomax.SleepWell.Zetia.Zocor.Amoxicillin.Cozaar.Female Pink Viagra.Lipothin.Buspar.Lasix.Benicar.Seroquel….