शिरीष कुमार मौर्य की दो कविताएं
(शिरीष कुमार मौर्य को लक्ष्मण प्रसाद मंडलोई सम्मान पर ‘आखर’ की तरफ से बधाई.)
जब रात के दो बजते हैं !
जब रात के दो बजते हैं
प्रेम सो चुका होता है श्लथ होकर
मेरे आसपास आती है
उसके खर्राटों की हल्की-सी आवाज़
जब रात के दो बजते हैं
मैं देखता हूँ बन्द दरवाज़ों के बाहर नैनीताल का तारों भरा सुशीतल आसमान
जब रात के दो बजते हैं
मैं हैरान रह जाता हूँ
यह जानकर
कि इस वक़्त सिर्फ़ मेरा है ककड़ी के आकार वाला
घर के ठीक नीचे का वह हरा ताल
और उसमें दिखाई नहीं दे रही कोई भी नाव
जब रात के दो बजते हैं
सात की उम्र का मेरा बच्चा कुनमुनाता है
कभी मुस्कुराता-हँसता
तो कभी बिसूरता है
दरअसल
अजीब-से सपनों भरी उसकी इस सबसे गहरी नींद में ही
उसका भविष्य छुपा है
जब रात के दो बजते हैं
और जाहिर है असफल हो जाती है नींद की गोलियों की आख़िरी खुराक भी
तो मैं सोचता हूँ कि मेरी रात के बाहर भी कोई रात है और वहाँ भी
शायद दो बज गए होंगे
जब रात के दो बजते हैं
मैं थोड़ा और लड़ाकू हो जाता हूँ
देखता हूँ
बाथरूम के आईने में अपना ख़ामोश पथरीला चेहरा
जब रात के दो बजते हैं
मेरे भीतर जागता है कवि जैसा कोई एक शख़्स
लगातार
और खुद के होने पर रोता है चुपचाप
अपनी आँखों में अगले दिन सबके बीच
हँस पाने लायक
मनुष्यता इकट्ठी करता हुआ !
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मैं नैनीताल में लखनऊ के पड़ोस मे रहता हूँ
मैं उसे
एक बूढ़ी विधवा पड़ोसन भी कह सकता था
लेकिन मैं उसे सत्तर साल पुरानी देह में बसा एक पुरातन विचार कहूँगा
जो व्यक्त होता रहता है
गाहे-बगाहे
एक साफ़-सुथरी, कोमल और शीरीं ज़बान में
जिसे मैं लखनउआ अवधी कहता हूँ
इस तरह
मैं नैनीताल में लखनऊ के पड़ोस में रहता हूँ
मैं उसे देखता हूँ पूरे लखनऊ की तरह और वो बरसों पहले खप चुकी अपनी माँ को विलापती
रक़ाबगंज से दुगउआँ चली जाती है
और अपनी घोषित पीड़ा से भरी
मोतियाबिंदित
धुँधली आँखों में
एक गंदली झील का उजला अक्स बनाती है
अचानक
किंग्स इंग्लिश बोलने का फ़र्राटेदार अभ्यास करने लगता है
बग़ल के मकान में
शेरवुड से छुट्टी पर आया बारहवीं का एक होनहार छात्र
तो मुझे
फोर्ट विलियम कालेज
जार्ज ग्रियर्सन
और वर्नाक्यूलर जैसे शब्द याद आने लगते हैं
और भला हो भी क्या सकता है
विश्वविद्यालय में हिंदी पढ़ानेवाले एक अध्यापक के लगातार सूखते दिमाग़ में?
पहाड़ी चौमासे के दौरान
रसोई में खड़ी रोटी पकाती वह लगातार गाती है
विरहगीत
तो उसका बेहद साँवला दाग़दार चेहरा मुझे जायसी की तरह लगता है
और मैं खुद को बैठा पाता हूँ
लखनऊ से चली एक लद्धड़ ट्रेन की खुली हवादार खिड़की पर
इलाहाबाद पहुँचने की उम्मीद में
पीछे छूटता जाता है एक छोटा-सा स्टेशन
… अमेठी
झरते पत्तों वाले पेड़ के साये में मूर्च्छित-सी पड़ी दीखती है
एक उजड़ती मज़ार
उसके पड़ोस में होने से लगातार प्रभावित होता है मेरा देशकाल
हर मंगलवार
ज़माने भर को पुकारती और कुछ अदेखे शत्रुओं को धिक्कारती हुई
वह पढ़ती है सुन्दरकांड
और मैं बिठाता हूँ
बनारसी विद्व जनों के सताए तुलसी को अपने अनगढ़ घर की सबसे आरामदेह कुर्सी पर
पिलाता हूँ नींबू की चाय
जैसे पिलाता था पन्द्रह बरस पहले नागार्जुन को किसी और शहर में
जब तक ख़त्म हो पड़ोस में चलता उनका कर्मकाण्ड
मैं गपियाता हूँ तुलसी बाबा से
जिनकी आँखों में दुनिया-जहान से ठुकराये जाने का ग़म है
और आवाज़ में
एक अजब-सी कड़क विनम्रता
ठीक वही
त्रिलोचन वाली
चौंककर देखता हूँ मैं
कहीं ये दाढ़ी-मूँछ मुँडाए त्रिलोचन ही तो नहीं !
क्यों?
क्यों इस तरह एक आदमी बदल जाता है दूसरे ‘आदमी’ में ?
एक काल बदल जाता है दूसरे ‘काल’ में?
एक लोक बदल जाता है दूसरे ‘लोक’ में?
यहाँ तक कि नैनीताल की इस ढलवाँ पहाड़ी पर बहुत तेज़ी से अपने अंत की तरफ़ बढ़ती
वह औरत भी बदल जाती है
एक
समूचे
सुन्दर
अनोखे
और अड़ियल अवध में
उसके इस कायान्तरण को जब-तब अपनी ठेठ कुमाऊँनी में दर्ज़ करती रहती है
मेरी पत्नी
और मैं भी पहचान ही जाता हूँ जिसे
अपने मूल इलाक़े को जानने-समझने के
आधे-अधूरे
सद्यःविकसित
होशंगाबादी किंवा बुन्देली जोश में !
इसी को हिंदी पट्टी कहते हैं शायद
जिसमें रहते हुए हम इतनी आसानी से
नैनीताल में रहकर भी
रह सकते हैं
दूर किसी लखनऊ के पड़ोस में !
(http://www.anunaad.blogspot.com)

बहुत क्लासिक कविताएं पढनें को मिली. धन्यवाद
मैं नैनीताल में लखनऊ के पड़ोस मे रहता हूँ…और हम कवि के करीब रहते है. ये कविताएं हमारे समाज को समझने में मदद करती है.
कवि ने जिस मानवता को जिन्दा रखने कि बात कि है ..आज हम सभी उसी लडाई में लगे है… और तमाम लोग उस मानवता को बचाय रखेंगे. कवि और आखर को ढेरों बधाई.
बेहतरिन कविताएं… आखर और कवि को बधाई.
उस बूढ़ी विधवा को हम भी महसुस करते है. पर क्या हम उस जवाब पीढी को बूढा देने के खिलाफ बोले और नये सुरज को उगते देखे.