खेत और खुदरा कारोबार कंपनियों के हवाले
कृषि और खुदरा व्यापार दुनिया का सबसे बड़ा उद्योग है. लेकिन इधर कुछ दशकों में दुनिया की कुछ बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने बड़ी रणनीतिक सोच समझ के साथ कृषि और खुदरा दोनों पर अपना एकाधिकार स्थापित करने की कोशिश की है. पश्चिम के जिन देशों में इन कंपनियों का जन्म हुआ वहां लगभग पूरे व्यापार को अपने हाथ में लेने के बाद ये कंपनियां अब भारत में अपना पैर पसार रही हैं.
पूंजी के बड़े लाभ की संभावना को देखते हुए भारतीय कंपनियां भी उनके साथ मिलकर संयुक्त उद्यम लगा रही हैं और भविष्य में अपना लाभ सुनिश्चित कर रही हैं. वैस तो व्यापारिक गतिविधियों पर सवाल उठाना नाजायज काम समझा जाता है लेकिन इस मामले में चिंता करने की बात इसलिए भी है क्योंकि अभी इस क्षेत्र में न तो कोई नियामक प्राधिकरण और न ही कोई खास नियम कानून बने हैं.
आईसीआरईआर द्वारा जारी एक दस्तावेज में कहा गया है कि भारत में संगठित खुदरा व्यापार सालाना 45-50 फीसदी की दर से बढ़ रहा है. नील्सन का आठ शहरों में किया गया एक सर्वे बताता है कि नवंबर 2006 से नवंबर 2007 के बीच भारत में ब्राण्डेड स्टोर के जरिए सामान की बिक्री में सीधे तौर पर 90 फीसदी का उछाल आया है. आईसीआरईआर का आंकलन है कि 2006-07 में 322 अरब डालर का खुदरा कारोबार 2011-12 में 590 अरब अमेरिकी डालर को छू लेगा.
जाहिर है खुदरा कारोबार बड़े पूंजीपतियों के लिए संभावनाओं का नया द्वार है. इसलिए बड़े कारोबार इस छोटे धंधे में तेजी से उतर रहे हैं. भारती वालमार्ट का समझौता इस दिशा में उठा निर्णायक कदम है. इसी के साथ भारती इंटरप्राईजेज ने ब्रिटेन की कंपनी एलरो के साथ मिलकर फील्ड फ्रेश नाम से भी फल सब्जियों के कारोबार में अपने आप को उतार दिया है. कंपनी को उम्मीद है कि अगले पांच सालों में वे 41 अरब का सालाना व्यापार करेंगे. भारती के पास पंजाब में 4000 एकड़ जमीन पहले से है और अब वह राजस्थान, उत्तरांचल और महाराष्ट्र में बड़े पैमाने पर जमीन खरीदना चाहती है. कंपनी की योजना है कि अगले कुछ सालों में वह 20,000 एकड़ जमीन पर खेती करे. इसके लिए वह सीधे जमीन खरीदने की बजाय किसानों के साथ कन्ट्रेक्ट फार्मिंग का रास्ता अख्तियार कर रही है. इसी तरह टाटा की कंपनी खेत से एग्री प्रोड्यूज नामक कंपनी बड़े पैमाने पर बायोफ्यूल, सब्जी, फल उत्पादन के क्षेत्र में उतरने की तैयारी कर रही है. कंपनी को उम्मीद है कि जल्द ही वह एक अरब डालर के बिक्री का लक्ष्य हासिल कर लेगी.
खेत से सीधे दुकान तक की अपनी योजना को पूरा करने के लिए रिलायंस रिटेल लिमिटेड भी 250 करोड़ रुपये के निवेश की योजना पर काम कर रहा है. रिलायंस खेत से सीधे अपनी दुकानों पर बेचने के साथ ही अन्य खुदरा व्यापारियों को भी सप्लाई करेगा. इसी के साथ रिलायंस रिटेल ने चार कंपनियों की भी स्थापना की है. रिलायंस एग्री प्रोडक्ट डिस्ट्रीब्यूशन कलेक्शन सेंटर का काम देखेगी, रिलायंस एग्री प्रोजेक्ट्स ठेके पर खेत हथियाएगी और अपने निजी खेत तैयार करके उन पर खेती करेगी, रिलायंस इंटीग्रेटेड एग्री सोल्युशन ग्रामीण व्यावसायिक हब्स की स्थापना करेगी. रिलायंस पहले ही हिमाचल प्रदेश हार्टिकल्चर प्रोड्यूस मार्केटिंग एण्ड प्रोसेसिंग कारपोरेशन से 3000 एकड़ बागान ठेके पर ले चुका है. भारती वालमार्ट ने सेवों के रखरखाव और वितरण के लिए रिलायंस के साथ एक समझौता किया है.रिलायंस रिटेल की योजना है कि 784 शहरों में 6000 होलसेल मार्केट और 16,000 ग्रामीण बिजनेस हब बनाये जाएं. खेती और फल सब्जियो के कारोबार से रिलायंस अगले कुछ सालों में 400 अरब रुपये का कारोबार करना चाहता है.
रिलायंस और भारती की ही तर्ज पर महिन्द्रा भी खेत में उतरने के लिए तैयार है. महिन्द्रा शुभलाभ एक लाख एकड़ जमीन पर खेती करने की योजना बना रहा है. गोदरेज सीधे खेती में तो नहीं उतर रहा है लेकिन उसने आधार नाम से अपनी कंपनी शुरू की है जो खेती के लिए कंसल्टेन्ट की भूमिका निभाएगा.
अभी तक के कंपनियों के रूख को देखें तो साफ हो जाता है कि कंपनियां खेत से बाजार तक पूरी व्यवस्था पर अपना एकाधिकार चाहती हैं. इसलिए वे न केवल खेती कर रही हैं बल्कि सप्लाई चेन और वितरण पर अपना पूरा नियंत्रण स्थापित कर रही हैं. फिलहाल तो कंपनियां सस्ता और सुंदर का नारा दे रही हैं लेकिन यह सब थोड़े दिनों की बात होगी. एक बार कंपनियों का खेत, उत्पादन और बाजार पर एकाधिकार हो जाए तो पूरे देश के खाद्यान्न पर सिर्फ कुछ कंपनियों की मोनोपोली रहेगी. कंपनियों के इस काम में सरकार उसकी पूरी मदद कर रही है. कंपनियों को खेत में धंसाने के लिए सरकार हर तरह के नियम कानून में छूट दे रही है.होलसेल-कैश एण्ड कैरी, निर्यात, वेयरहाउसिंग, कोल्डस्टोरेज, रियल एस्टेट और फूड प्रोसेसिंग तक हर जगह सरकार कंपनियों के साथ खड़ी है. खाद्य प्रसंस्करण मंत्रालय की योजना है कि अगले पांच सालों में वह देश में कम से कम 30 मेगा फूड पार्क बनायेगी. ये फूड पार्क निजी कंपनियों द्वारा विकसित किये जाएंगे और इन्हें सरकार के द्वारा भारी सब्सिडी जी जाएगी. यही फूड पार्क कारपोरेट खुदरा व्यापारियों के लिए सप्लायर का काम करेंगे.
सरकार और कंपनियों की इन योजनाओं से देश में बहुत कुछ बदलाव नजर आयेगा. कहने के लिए अच्छाई और बुराई तो हर व्यवस्था में होती है लेकिन एक बात पक्के तौर पर होगी कि बहुत सारे किसानों, आढ़तियों, व्यापारियों और छोटे दुकानदारों की सफाई हो जाएगी. देश के समग्र खाद्यान्न और उससे पैदा होने वाले व्यापार और रोजगार पर देश-विदेश की कुछ चुनिंदा कंपनियों का आधिपत्य होगा. यह सब होने में बहुत समय नहीं लगेगा जिस तरह से कंपनियां काम कर रही है बहुत जल्दी यह एक हकीकत में तब्दील हो जाएगा. एक अरब की आबादी पार कर चुके एक देश में जहां आज भी देश के 80 फीसदी लोग केवल किसानी और छोटे मोटे खुदरा कारोबार के भरोसे जिंदा है ऐसी नीतियां क्या असर दिखाएंगी क्या कोई अंदाज भी लगा सकता है?
धर्मेन्द्र कुमार
(धर्मेन्द्र कुमार इंडिया एफडीआई वाच के डायरेक्टर हैं.)
