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	<title>Comments on: अपील-&#8217;अपनी राष्ट्रभाषा और जनभाषा हिन्दी को बचाओ’</title>
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	<description>युग बोध और सांस्कृतिक सरोकारों की वेब पत्रिका</description>
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		<title>By: shapat</title>
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		<dc:creator>shapat</dc:creator>
		<pubDate>Sat, 06 Mar 2010 02:55:42 +0000</pubDate>
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		<title>By: krishna</title>
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		<dc:creator>krishna</dc:creator>
		<pubDate>Sat, 20 Feb 2010 18:48:38 +0000</pubDate>
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		<description>even indians appose their national language, please read it http://dudhwalive.com</description>
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		<title>By: Devi nangrani</title>
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		<dc:creator>Devi nangrani</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 17 Dec 2009 10:06:26 +0000</pubDate>
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		<description>हिंदी भाषा भारतीय जनता का मान सन्मान

हिंदी भाषा भारतीय जनता के विचारों का माध्यम है, अपने आप को अभिव्यक्त करने की मूल शैली है और इसी नींव पर टिकी है भारतीय संस्क्रुति. बाल गँगाधर तिलक का कथन इसी सत्य को दिशा दे रहा है &quot;देश की अखंडता-आज़ादी के लिए हिंदी भाषा एक पुल है&quot;.

 हमें अपनी हिंदी ज़ुबाँ चाहिये

सुनाए जो लोरी वो माँ चाहिये

 

कहा किसने सारा जहाँ चाहिये

हमें सिर्फ़ हिन्दोस्ताँ चाहिये

 

तिरंगा हमारा हो ऊँचा जहाँ

निगाहों में वो आसमाँ चाहिये

 

मुहब्बत के बहते हों धारे जहाँ

वतन ऐसा जन्नत निशाँ चाहुये

 

जहाँ देवी भाषा के महके सुमन

वो सुन्दर हमें गुलसिताँ चाहिये

भारतवर्ष की बुनियाद &quot;विविधता में एकता&quot; की विशेषता पर टिकी है और इसी डोर में बंधी है देश की विभिन्न जातियाँ, धर्म व भाषाएँ. भारतीय भाषाओं के इतिहास में एक नवसंगठित सोच से नव निर्माण की बुनियाद रखी जा रही है. भाषा, सभ्यता, संस्कृति, का चोली दामन का साथ है. भारत से विभिन्न देशों में हमारे भारतीय जाकर बसे हैं -मारिशियस, सूरीनाम, जापान, मास्को, Thailand, England, USA, Canada, जहाँ उनके साथ गई है कशमीर से कन्याकुमारी तक के अनेक प्राँतों की भाषाएँ, जिसमें है उत्तर की पंजाबी, सिंधी, उड़ीया, म.पी, यू.पी की भाषाएँ, गुजराती, बंगाली, राजस्थानी,मराठी, और दक्षिण प्रांतों की तमिल, तेलुगू और कोंकणी भाषा. यही भाषाएँ अपनी अपनी संस्कृति से जुड़ी रहकर अपने प्राँतीय चरित्र को उजागर करती है.  संस्कृति को नष्ट होने से बचाना है तो सर्व प्रथम अपनी राष्ट्र भाषा हिंदी को बचाना पड़ेगा.

आज़ादी के पहले और आज़ादी के बाद जो भारतीय विदेशों में जाकर बसे उनमें सामाजिक फ़र्क है. आज़ादी के पहले वाले मजबूर, मज़दूर, कुछ अनपढ़ लोग ग़रीबी का समाधान पाने के लिये मारिशियस, सूरीनाम, गयाना, त्रिनदाद में जा बसे जहाँ  उन्हें अपनी ज़रूरतों के लिये सँघर्ष करना पडा़.

आज़ादी के बाद जो भारतीय गए वो कुशल श्रमिक भारतीय थे, पढ़े लिखे थे,  और महत्वकांक्षा वाले व्यक्ति थे. उनमें आत्म विकास की चाह और साथ साथ अपनी मात्र भूमि के विकास की चाह भी थी. भारतीय धर्म,  संस्कृति, साहित्य की पुष्ठ भूमि उनके पास भी है, लेकिन उन्हें जो अभाव विदेशों में महसूस होता है वह है, आपसी संबंधों का अभाव, पुरानी और नई पीढ़ी के बीच बढ़ता हुआ generation gap.

 

             वहाँ की विकसित जीवन शैली और भारतीय सभ्यता, इन दोनों जीवन के रहन-सहन के अंतर के कारण एक असुरक्षा की भावना उत्पन्न होती है. संस्कृतिक मूल्यों को लेकर, पारिवारिक सँबंधों को लेकर, एक अंतर-द्वंद्व पैदा होता है,  और यही अंतर-द्वंद्व इस भारतीय भाषा के लिये बड़ी बुनियाद है.

हर इक देश की तरक्की उसकी भाषा से जुड़ी हुई होती है, जो हमारे अस्तित्व की पहचान है, उसकी अपनी गरिमा है. भाषा केवल अभिव्यक्ति ही नहीं</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>हिंदी भाषा भारतीय जनता का मान सन्मान</p>
<p>हिंदी भाषा भारतीय जनता के विचारों का माध्यम है, अपने आप को अभिव्यक्त करने की मूल शैली है और इसी नींव पर टिकी है भारतीय संस्क्रुति. बाल गँगाधर तिलक का कथन इसी सत्य को दिशा दे रहा है &#8220;देश की अखंडता-आज़ादी के लिए हिंदी भाषा एक पुल है&#8221;.</p>
<p> हमें अपनी हिंदी ज़ुबाँ चाहिये</p>
<p>सुनाए जो लोरी वो माँ चाहिये</p>
<p>कहा किसने सारा जहाँ चाहिये</p>
<p>हमें सिर्फ़ हिन्दोस्ताँ चाहिये</p>
<p>तिरंगा हमारा हो ऊँचा जहाँ</p>
<p>निगाहों में वो आसमाँ चाहिये</p>
<p>मुहब्बत के बहते हों धारे जहाँ</p>
<p>वतन ऐसा जन्नत निशाँ चाहुये</p>
<p>जहाँ देवी भाषा के महके सुमन</p>
<p>वो सुन्दर हमें गुलसिताँ चाहिये</p>
<p>भारतवर्ष की बुनियाद &#8220;विविधता में एकता&#8221; की विशेषता पर टिकी है और इसी डोर में बंधी है देश की विभिन्न जातियाँ, धर्म व भाषाएँ. भारतीय भाषाओं के इतिहास में एक नवसंगठित सोच से नव निर्माण की बुनियाद रखी जा रही है. भाषा, सभ्यता, संस्कृति, का चोली दामन का साथ है. भारत से विभिन्न देशों में हमारे भारतीय जाकर बसे हैं -मारिशियस, सूरीनाम, जापान, मास्को, Thailand, England, USA, Canada, जहाँ उनके साथ गई है कशमीर से कन्याकुमारी तक के अनेक प्राँतों की भाषाएँ, जिसमें है उत्तर की पंजाबी, सिंधी, उड़ीया, म.पी, यू.पी की भाषाएँ, गुजराती, बंगाली, राजस्थानी,मराठी, और दक्षिण प्रांतों की तमिल, तेलुगू और कोंकणी भाषा. यही भाषाएँ अपनी अपनी संस्कृति से जुड़ी रहकर अपने प्राँतीय चरित्र को उजागर करती है.  संस्कृति को नष्ट होने से बचाना है तो सर्व प्रथम अपनी राष्ट्र भाषा हिंदी को बचाना पड़ेगा.</p>
<p>आज़ादी के पहले और आज़ादी के बाद जो भारतीय विदेशों में जाकर बसे उनमें सामाजिक फ़र्क है. आज़ादी के पहले वाले मजबूर, मज़दूर, कुछ अनपढ़ लोग ग़रीबी का समाधान पाने के लिये मारिशियस, सूरीनाम, गयाना, त्रिनदाद में जा बसे जहाँ  उन्हें अपनी ज़रूरतों के लिये सँघर्ष करना पडा़.</p>
<p>आज़ादी के बाद जो भारतीय गए वो कुशल श्रमिक भारतीय थे, पढ़े लिखे थे,  और महत्वकांक्षा वाले व्यक्ति थे. उनमें आत्म विकास की चाह और साथ साथ अपनी मात्र भूमि के विकास की चाह भी थी. भारतीय धर्म,  संस्कृति, साहित्य की पुष्ठ भूमि उनके पास भी है, लेकिन उन्हें जो अभाव विदेशों में महसूस होता है वह है, आपसी संबंधों का अभाव, पुरानी और नई पीढ़ी के बीच बढ़ता हुआ generation gap.</p>
<p>             वहाँ की विकसित जीवन शैली और भारतीय सभ्यता, इन दोनों जीवन के रहन-सहन के अंतर के कारण एक असुरक्षा की भावना उत्पन्न होती है. संस्कृतिक मूल्यों को लेकर, पारिवारिक सँबंधों को लेकर, एक अंतर-द्वंद्व पैदा होता है,  और यही अंतर-द्वंद्व इस भारतीय भाषा के लिये बड़ी बुनियाद है.</p>
<p>हर इक देश की तरक्की उसकी भाषा से जुड़ी हुई होती है, जो हमारे अस्तित्व की पहचान है, उसकी अपनी गरिमा है. भाषा केवल अभिव्यक्ति ही नहीं</p>
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		<title>By: Karmendu Shishir</title>
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		<dc:creator>Karmendu Shishir</dc:creator>
		<pubDate>Tue, 15 Dec 2009 08:51:40 +0000</pubDate>
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		<description>priya bhai
lampat samay aur lutero ke shasan me kis-kis ko leker patra likhiyega.hindi ko jis tarah hindi ki sansthaye loot rahi hai usme dhwans hi dhwans hai.fir bhi hum -aap chup to nahi rah sakte mujhe bhi apne sath mane.</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>priya bhai<br />
lampat samay aur lutero ke shasan me kis-kis ko leker patra likhiyega.hindi ko jis tarah hindi ki sansthaye loot rahi hai usme dhwans hi dhwans hai.fir bhi hum -aap chup to nahi rah sakte mujhe bhi apne sath mane.</p>
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		<title>By: चंद्रशेखर गोन्झाल्वीस</title>
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		<dc:creator>चंद्रशेखर गोन्झाल्वीस</dc:creator>
		<pubDate>Wed, 02 Dec 2009 10:21:21 +0000</pubDate>
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		<description>अरे बाबा मेरेकु हिंदी नही आती। च्यायला जल्दीमें कभी कभी मेरीच भाषा नही समझती तो ये हिंदी कशाला समझेगी। पण मी बी भारतीय च है बाबा। मेरेकुं हिंदी बोलनेकु भी नही आती तो लिखनेकु कैसे आएगी रे बाबा। इधर मेरे राज्य में तो बहुतसारे माणुसको पढनेलिखनेकु भी नही आता । मेरे जैसे अनपढ लोग तो पुरा इंडीयामें बहुत है । उनके बारेमें कुछ सोचो । हिंदीकु राष्ट्रभाषा करोगे तो मेरा क्या होगा । किधरकु अरजी-फरजी करने का हिंदी में लिखने को तो आना चाहिए । ये तो ऐसा हो रहा है की भाई हिंदी को राष्ट्रभाषा करेगे तो कल हिंदी में बोलना कम्प्ल्सरी हो जाएगा आख्के इंडीया में । तुम हिंदी अिस्मता के चक्करमें कहीं गुंगे को हिंदी में बोलना कम्प्लसरी तो नही करोगे?</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>अरे बाबा मेरेकु हिंदी नही आती। च्यायला जल्दीमें कभी कभी मेरीच भाषा नही समझती तो ये हिंदी कशाला समझेगी। पण मी बी भारतीय च है बाबा। मेरेकुं हिंदी बोलनेकु भी नही आती तो लिखनेकु कैसे आएगी रे बाबा। इधर मेरे राज्य में तो बहुतसारे माणुसको पढनेलिखनेकु भी नही आता । मेरे जैसे अनपढ लोग तो पुरा इंडीयामें बहुत है । उनके बारेमें कुछ सोचो । हिंदीकु राष्ट्रभाषा करोगे तो मेरा क्या होगा । किधरकु अरजी-फरजी करने का हिंदी में लिखने को तो आना चाहिए । ये तो ऐसा हो रहा है की भाई हिंदी को राष्ट्रभाषा करेगे तो कल हिंदी में बोलना कम्प्ल्सरी हो जाएगा आख्के इंडीया में । तुम हिंदी अिस्मता के चक्करमें कहीं गुंगे को हिंदी में बोलना कम्प्लसरी तो नही करोगे?</p>
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		<title>By: अखिलेश शर्मा</title>
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		<dc:creator>अखिलेश शर्मा</dc:creator>
		<pubDate>Wed, 02 Dec 2009 09:36:09 +0000</pubDate>
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		<description>रोहितकुमार हैपी नें तो हमारी आँखे खोल दी है । हिंदी अपनी राष्ट्रभाषा नही है यह सच है । तमाम हिंदी प्रेमीयोंसे निवेदन है की कृपया हिंदी भाषा का उल्लेख राष्ट्रभाषा न करें । भारतीय घटनाके अनुसार अनुच्छेद 8 की तहत भारत की सभी 18 भाषाए राष्ट्रभाषा कहलायी जाती है । यदी कोई अपनी भाषा एकमेव राष्ट्रभाषा कहलाता है तो वह भारतीय संविधान का अपमान कहा जाता है । 

15 अगस्त 1947 के बाद भारत का राज्यवार बटवारा करते समय स्वगीँय पंडीत नेहरू तथा तत्कालीन राजनितीज्ञोनें भाषा के तहत राज्य निर्माण किया था अतएव सभी राज्य अपनी अपनी मूल भाषा (मातृभाषा) में अंतर्गत व्यवहार देख सकें । इस रचना का उद्देश एकमात्र यही था की अपनी अपनी मातृभाषामें शैक्षणिक, सामाजिक तथा सांस्कृतिक उत्कषँ हो सकें । केंद्र सरकार द्वारा निर्देशीत त्रिभाषा सूत्र भी यही कहलाता है की हर राज्यमें उस राज्य की मातृभाषा ही सर्वोच्च तथा श्रेष्ठ है । भारत में जादातर लोगोंको हिंदी समझती है इसलिए हिंदी को राष्ट्रभाषा करना उचीत नही है । केवल उत्तरभारतमें हिंदी समझी जाती है, पूर्व तथा दक्षिण भारत के भारतीय हिंदी को समझ नही पाते । उनपर आप अपनी भाषा थोपनेंकी जुर्रत ना करें । मातृभाषा सर्वश्रेष्ठ होती है - उसका आदर करना सिखें । अगर आप हिंदी भाषीक हो तो आपकी वह मातृभाषा है । अगर कोई पंजाबी है तो उसकी मातृभाषा पंजाबी है तथा कोई मराठी है उसकी मातृभाषा मराठी है ।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>रोहितकुमार हैपी नें तो हमारी आँखे खोल दी है । हिंदी अपनी राष्ट्रभाषा नही है यह सच है । तमाम हिंदी प्रेमीयोंसे निवेदन है की कृपया हिंदी भाषा का उल्लेख राष्ट्रभाषा न करें । भारतीय घटनाके अनुसार अनुच्छेद 8 की तहत भारत की सभी 18 भाषाए राष्ट्रभाषा कहलायी जाती है । यदी कोई अपनी भाषा एकमेव राष्ट्रभाषा कहलाता है तो वह भारतीय संविधान का अपमान कहा जाता है । </p>
<p>15 अगस्त 1947 के बाद भारत का राज्यवार बटवारा करते समय स्वगीँय पंडीत नेहरू तथा तत्कालीन राजनितीज्ञोनें भाषा के तहत राज्य निर्माण किया था अतएव सभी राज्य अपनी अपनी मूल भाषा (मातृभाषा) में अंतर्गत व्यवहार देख सकें । इस रचना का उद्देश एकमात्र यही था की अपनी अपनी मातृभाषामें शैक्षणिक, सामाजिक तथा सांस्कृतिक उत्कषँ हो सकें । केंद्र सरकार द्वारा निर्देशीत त्रिभाषा सूत्र भी यही कहलाता है की हर राज्यमें उस राज्य की मातृभाषा ही सर्वोच्च तथा श्रेष्ठ है । भारत में जादातर लोगोंको हिंदी समझती है इसलिए हिंदी को राष्ट्रभाषा करना उचीत नही है । केवल उत्तरभारतमें हिंदी समझी जाती है, पूर्व तथा दक्षिण भारत के भारतीय हिंदी को समझ नही पाते । उनपर आप अपनी भाषा थोपनेंकी जुर्रत ना करें । मातृभाषा सर्वश्रेष्ठ होती है &#8211; उसका आदर करना सिखें । अगर आप हिंदी भाषीक हो तो आपकी वह मातृभाषा है । अगर कोई पंजाबी है तो उसकी मातृभाषा पंजाबी है तथा कोई मराठी है उसकी मातृभाषा मराठी है ।</p>
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		<title>By: vikram sachdev</title>
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		<dc:creator>vikram sachdev</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 26 Nov 2009 18:08:14 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://aakhar.fwebpages.com/articles/%e2%80%99%e0%a4%85%e0%a4%aa%e0%a4%a8%e0%a5%80-%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%b7%e0%a5%8d%e0%a4%9f%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%ad%e0%a4%be%e0%a4%b7%e0%a4%be-%e0%a4%b9%e0%a4%bf%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e0%a4%a6%e0%a5%80/#comment-615</guid>
		<description>zara gaur karain aur sochain .
pakistan se joojhne se pehle hamain eaisi hindi  aur rashtra virodhi taakton se nibatna chahiye.
ज्ररा गॉर करे ऑर सो्चे .
पकिस्तान से जूझने से पहले ह् में ऍसी हिंदी ऑर राष्ट्‍ विरोधी ताक तों से निब ट्ना चहिए।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>zara gaur karain aur sochain .<br />
pakistan se joojhne se pehle hamain eaisi hindi  aur rashtra virodhi taakton se nibatna chahiye.<br />
ज्ररा गॉर करे ऑर सो्चे .<br />
पकिस्तान से जूझने से पहले ह् में ऍसी हिंदी ऑर राष्ट्‍ विरोधी ताक तों से निब ट्ना चहिए।</p>
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	<item>
		<title>By: माधव नागदा , राजस्थान</title>
		<link>http://aakhar.fwebpages.com/articles/%e2%80%99%e0%a4%85%e0%a4%aa%e0%a4%a8%e0%a5%80-%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%b7%e0%a5%8d%e0%a4%9f%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%ad%e0%a4%be%e0%a4%b7%e0%a4%be-%e0%a4%b9%e0%a4%bf%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e0%a4%a6%e0%a5%80/comment-page-2/#comment-601</link>
		<dc:creator>माधव नागदा , राजस्थान</dc:creator>
		<pubDate>Tue, 24 Nov 2009 08:30:13 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://aakhar.fwebpages.com/articles/%e2%80%99%e0%a4%85%e0%a4%aa%e0%a4%a8%e0%a5%80-%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%b7%e0%a5%8d%e0%a4%9f%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%ad%e0%a4%be%e0%a4%b7%e0%a4%be-%e0%a4%b9%e0%a4%bf%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e0%a4%a6%e0%a5%80/#comment-601</guid>
		<description>महाराष्ट्र विधानसभा में जो कुछ हुआ वह शर्मनाक है । किसी सदस्य को संविधान में बोलने से रोकना भारतीय संविधान का अपमान है । फिर यह तो हिन्दी भाषा  का मामला है । हिन्दी ,जो हमारी  अस्मिता की प्रतिक है ,राष्ट्रीय  गोरव है ,जातीय पहचान है , हमारा स्वाभिमान है । इसी भाषा  में क्रान्तिकारियो ने अंग्रेजो को ललकारा । इसी  भाषा में जोच्चीले तराने गाये गये ओर इसी भाषा  में आजादी के मतवालो की तकरीरो से ठंडे खून में भी स्वतंत्रता की लपटे उठने लगी । लोकमान्य बालगंगाधर तिलक , महात्मा गांधी , सरदार भगतसिंह जैसे अहिन्दी भाषी  क्षेत्रो से आये आन्दोलनकारियो ने हिन्दी को ही लडाई का हथियार बनाया ओर इसे पूरा सम्मान प्रदान किया । अफसोस की आज के अधकचरे ,अधपढे, राजनेताओ को हमारे गौरवपूर्ण इतिहास की कोई जानकारी नही है । यदि है तो वे अपनी दूषित  राजनीति के चलते देच्च को बांटने की साजिश  में भागीदार है । ऐसे लोगो को क्या कहां जाय.

सवाल यह है कि हिन्दी प्रेमी क्या कर रहे है. और हिन्दी के नाम पर रोटीयॉ सेकने वाले क्या कर रहे है.
फिल्मी सितारो को ही लें । वे हिन्दी फिल्मो से करोड़ो कमा रहे है । परन्तु जब वे मीडिया में इन्टरव्यू देते है तो क्या देखने को मिलता है ? एक वाक्य तक हिन्दी का ठीक ढंग से नही बोल सकते । ऐसा लगता है जैसे उन्हे हिन्दी में बात करते हुए शर्म  महसूस हो रही है । क्या हमने कभी उनके इसभाषाई   दोगलेपन पर सवाल किया है ?
                यही हाल राजनेताओ का भी है । वे जिस भाषा में मतदाताओ के सम्मुख गिडगिडाकर सांसद की कुर्सी तक पहूंचते है वे संसद में किस भाषा  में बहस करते है ? किस  भाषा में शपथ लेते है ? लोक सभा में पहुचते ही उन्हे अंग्रेजी प्यारी हो जाती है । वे आमजन की भाषा को भूल जाते है । इस बात को लेकर क्या कभी हिन्दी प्रेमियो ने उनका घेराव किया है? या विरोध स्वरूप एक पोस्टकार्ड भी डाला है ?

                 बैंक अपना सारा काम काज अंग्रेजी में करते है जबकि अधिकतर उपभोक्ताओ की भाषा हिन्दी है , खास कर उतरी भारत में । बैंक वालो को पुछो तो उनका जवाब होता है , क्या करे हमारे पास हिन्दी का सोफ्‌टवेयर नही है । विडम्बना यह की सोफ्‌टवेयर के क्षेत्र में भारतीय इंजिनियर दुनिया में नंबर वन है । अभी मनसे ने बी एस ई को चेतावनी दी है कि उनकी वेबसाइट मराठी में भी हो । और  बेवसाइट मराठी में बनना आरम्भ भी हो गयी है । क्या हिन्दी प्रेमियो ने बैंको को इस तरह की चेतावनी दी है ? चेतावनी तो दूर शायद कोइ आग्रह भी नही किया गया है ।
                दवा कंपनीयां अपने उत्पादो पर अंग्रेजी में निर्देश  लिखती है. अब तो आयुर्वेदिक दवा निर्मिता भी इस भेड चाल में सम्मिलित हो गये है । डॉक्टर लोग रोगी स्लीप पर अंग्रेजी में नुस्का लिखते है चाहे मरीज समझे या न समझे । इसके खिलाफ भी कोई सुगबुगाहट नही ।

कई हिन्दी भाषी  विवाह निमंत्रण पत्र अंग्रेजी में छपवाने लगे है । चाहे वेवाहिक कार्यक्रम में घर की महिलाये हिन्दी में गीत गाती हो । पिछले दिनो एक साहित्यकार मित्र मेरे पास अपने पुत्र की शादी  का अंग्रेजी में छपा निमंत्रण पत्र लेकर आये । हिन्दी साहित्यकारो का भी यह हाल है तो फिर कोई क्या करे । नाथद्वारा में हम कतिपय मित्रो ने यह तय किया है की अग्रेजी में छपा निमंत्रण पत्र आने पर हम उस विवाह समारोह का बहिस्कार करेगे चाहे वह व्यक्ति कितना ही घनिष्ट  रिश्तेदार  क्यो न हो ।
                हिन्दी की लुटिया डूबोने में हिन्दी के अखबारो का बहुत बड़ा हाथ है । जरा उनके महानगरी पन्ने  उठाकर देखिये । एक ही वाक्य में ढेरो अंग्रेजी शब्द  । हिंग्लिश  के नाम पर ये कैसा खिलवाड ? भाषाई  संस्कार सिखाने वाले समाचार पत्र ही पथ  भ्रष्ट  हो गये है । कुए में ही भांग घुल  गयी है ।
                दुनिया में शायद हिन्दुस्तान ही ऐसा देश  है जहां के प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति  को इस देश  की राष्ट्रभाषा  जानना जरूरी नही है । कितने दुःख की बात है ।
                 बहुत सी बाते है । &#039;&#039; आखर &#039;&#039; ने साहस पूर्वक , धारा के विपरीत जाते हुए जिस प्रकार हिन्दी के प्रति अपनी पक्षधरता जतायी है उसकी मै तहेदिल से तारीफ करता हूं । यही सच्ची पत्रकारिता है ।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>महाराष्ट्र विधानसभा में जो कुछ हुआ वह शर्मनाक है । किसी सदस्य को संविधान में बोलने से रोकना भारतीय संविधान का अपमान है । फिर यह तो हिन्दी भाषा  का मामला है । हिन्दी ,जो हमारी  अस्मिता की प्रतिक है ,राष्ट्रीय  गोरव है ,जातीय पहचान है , हमारा स्वाभिमान है । इसी भाषा  में क्रान्तिकारियो ने अंग्रेजो को ललकारा । इसी  भाषा में जोच्चीले तराने गाये गये ओर इसी भाषा  में आजादी के मतवालो की तकरीरो से ठंडे खून में भी स्वतंत्रता की लपटे उठने लगी । लोकमान्य बालगंगाधर तिलक , महात्मा गांधी , सरदार भगतसिंह जैसे अहिन्दी भाषी  क्षेत्रो से आये आन्दोलनकारियो ने हिन्दी को ही लडाई का हथियार बनाया ओर इसे पूरा सम्मान प्रदान किया । अफसोस की आज के अधकचरे ,अधपढे, राजनेताओ को हमारे गौरवपूर्ण इतिहास की कोई जानकारी नही है । यदि है तो वे अपनी दूषित  राजनीति के चलते देच्च को बांटने की साजिश  में भागीदार है । ऐसे लोगो को क्या कहां जाय.</p>
<p>सवाल यह है कि हिन्दी प्रेमी क्या कर रहे है. और हिन्दी के नाम पर रोटीयॉ सेकने वाले क्या कर रहे है.<br />
फिल्मी सितारो को ही लें । वे हिन्दी फिल्मो से करोड़ो कमा रहे है । परन्तु जब वे मीडिया में इन्टरव्यू देते है तो क्या देखने को मिलता है ? एक वाक्य तक हिन्दी का ठीक ढंग से नही बोल सकते । ऐसा लगता है जैसे उन्हे हिन्दी में बात करते हुए शर्म  महसूस हो रही है । क्या हमने कभी उनके इसभाषाई   दोगलेपन पर सवाल किया है ?<br />
                यही हाल राजनेताओ का भी है । वे जिस भाषा में मतदाताओ के सम्मुख गिडगिडाकर सांसद की कुर्सी तक पहूंचते है वे संसद में किस भाषा  में बहस करते है ? किस  भाषा में शपथ लेते है ? लोक सभा में पहुचते ही उन्हे अंग्रेजी प्यारी हो जाती है । वे आमजन की भाषा को भूल जाते है । इस बात को लेकर क्या कभी हिन्दी प्रेमियो ने उनका घेराव किया है? या विरोध स्वरूप एक पोस्टकार्ड भी डाला है ?</p>
<p>                 बैंक अपना सारा काम काज अंग्रेजी में करते है जबकि अधिकतर उपभोक्ताओ की भाषा हिन्दी है , खास कर उतरी भारत में । बैंक वालो को पुछो तो उनका जवाब होता है , क्या करे हमारे पास हिन्दी का सोफ्‌टवेयर नही है । विडम्बना यह की सोफ्‌टवेयर के क्षेत्र में भारतीय इंजिनियर दुनिया में नंबर वन है । अभी मनसे ने बी एस ई को चेतावनी दी है कि उनकी वेबसाइट मराठी में भी हो । और  बेवसाइट मराठी में बनना आरम्भ भी हो गयी है । क्या हिन्दी प्रेमियो ने बैंको को इस तरह की चेतावनी दी है ? चेतावनी तो दूर शायद कोइ आग्रह भी नही किया गया है ।<br />
                दवा कंपनीयां अपने उत्पादो पर अंग्रेजी में निर्देश  लिखती है. अब तो आयुर्वेदिक दवा निर्मिता भी इस भेड चाल में सम्मिलित हो गये है । डॉक्टर लोग रोगी स्लीप पर अंग्रेजी में नुस्का लिखते है चाहे मरीज समझे या न समझे । इसके खिलाफ भी कोई सुगबुगाहट नही ।</p>
<p>कई हिन्दी भाषी  विवाह निमंत्रण पत्र अंग्रेजी में छपवाने लगे है । चाहे वेवाहिक कार्यक्रम में घर की महिलाये हिन्दी में गीत गाती हो । पिछले दिनो एक साहित्यकार मित्र मेरे पास अपने पुत्र की शादी  का अंग्रेजी में छपा निमंत्रण पत्र लेकर आये । हिन्दी साहित्यकारो का भी यह हाल है तो फिर कोई क्या करे । नाथद्वारा में हम कतिपय मित्रो ने यह तय किया है की अग्रेजी में छपा निमंत्रण पत्र आने पर हम उस विवाह समारोह का बहिस्कार करेगे चाहे वह व्यक्ति कितना ही घनिष्ट  रिश्तेदार  क्यो न हो ।<br />
                हिन्दी की लुटिया डूबोने में हिन्दी के अखबारो का बहुत बड़ा हाथ है । जरा उनके महानगरी पन्ने  उठाकर देखिये । एक ही वाक्य में ढेरो अंग्रेजी शब्द  । हिंग्लिश  के नाम पर ये कैसा खिलवाड ? भाषाई  संस्कार सिखाने वाले समाचार पत्र ही पथ  भ्रष्ट  हो गये है । कुए में ही भांग घुल  गयी है ।<br />
                दुनिया में शायद हिन्दुस्तान ही ऐसा देश  है जहां के प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति  को इस देश  की राष्ट्रभाषा  जानना जरूरी नही है । कितने दुःख की बात है ।<br />
                 बहुत सी बाते है । &#8221; आखर &#8221; ने साहस पूर्वक , धारा के विपरीत जाते हुए जिस प्रकार हिन्दी के प्रति अपनी पक्षधरता जतायी है उसकी मै तहेदिल से तारीफ करता हूं । यही सच्ची पत्रकारिता है ।</p>
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		<title>By: govindmathur</title>
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		<dc:creator>govindmathur</dc:creator>
		<pubDate>Sat, 21 Nov 2009 08:21:49 +0000</pubDate>
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		<description>Dharm,Jati,Kshetriyata aur Bhasha, sab rajniti ke vishay ban gaye hai. ab kisi ko desh ki chinta nahin hai. har vyakti  kewal apna swarth dekh raha hai. Maharastra Vidhan Sabha me jo kuchh hua ghor nindniy hai. Hindi poore rashtra ki bhasha hai .Hindi ka Apman sahan nahi kiya ja sakta hai.</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>Dharm,Jati,Kshetriyata aur Bhasha, sab rajniti ke vishay ban gaye hai. ab kisi ko desh ki chinta nahin hai. har vyakti  kewal apna swarth dekh raha hai. Maharastra Vidhan Sabha me jo kuchh hua ghor nindniy hai. Hindi poore rashtra ki bhasha hai .Hindi ka Apman sahan nahi kiya ja sakta hai.</p>
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		<title>By: Shakeel Shaikh</title>
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		<dc:creator>Shakeel Shaikh</dc:creator>
		<pubDate>Fri, 20 Nov 2009 08:17:09 +0000</pubDate>
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		<description>jis trha se saden me mns ne marathi asmita ka mamla utaya wo 100% galt hai is ghatna ko mene sadan me akhon se  dekha hai marathi ke mudde ki ladayi ke liye sadan bhut achi jaga hai lekin sadan ko marthi ke nam per jis trha se badnam kar ke maharastra ka nav nirman kiya hai humare jaise mharastra ke rhene walo ke liye  sharm ki baat hai sadan ki man maryada ko malin kiya gaya hindi rastriya bhasha ka apman kiya gaya puri trha galat hai des ke savidan ke thet hi abu azmi ne shapat li hai raj thakre ko english our sanskurt me shapat lane walo ka virod karna chiye tha saden me jub sanskurt me english me shapat hui us wakt mns ke 13 mla q shant baite rhe ? us wakt marathi q yaad nhi aai ?</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>jis trha se saden me mns ne marathi asmita ka mamla utaya wo 100% galt hai is ghatna ko mene sadan me akhon se  dekha hai marathi ke mudde ki ladayi ke liye sadan bhut achi jaga hai lekin sadan ko marthi ke nam per jis trha se badnam kar ke maharastra ka nav nirman kiya hai humare jaise mharastra ke rhene walo ke liye  sharm ki baat hai sadan ki man maryada ko malin kiya gaya hindi rastriya bhasha ka apman kiya gaya puri trha galat hai des ke savidan ke thet hi abu azmi ne shapat li hai raj thakre ko english our sanskurt me shapat lane walo ka virod karna chiye tha saden me jub sanskurt me english me shapat hui us wakt mns ke 13 mla q shant baite rhe ? us wakt marathi q yaad nhi aai ?</p>
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