देश छुट जाता है, बाहरी रूप से , मगर देश नहीं छुटता अंतर्मन से क्यों होता है ऐसा सिर्फ हमारे साथ, हम भारतीयों के साथ, कि किस्मत की हवा जहाँ भी ले जाए हमें ,… धरती का कोई भी कोना हो , कैसे भी लोग हों,कोई भी भाषा हो, हम... (Continue reading)
काली आँधी के गुज़रने के बाद उसने देखा, चाँद खुद में सिमटा रात की सिलवटों में पड़ा था. मैंने उसे थामने को हाथ बढ़ाया तो बोला, मुझे मत छुओं मुझे ग्रहण लगा है. ————————————————— प्यार को मजबूरी का कफ़न ओढ़ा सुकून से सुलाया था, दुनियादारी की हवा उस को उड़ा ले गई और मेरी... (Continue reading)
महानगर में अकेले महानगर में पैदल चलते हुए अजीब सा अहसास होता है । बगल से गुजर जाते हैं हार्न बजाते हुए तेज गतिवाले वाहन पर्यटकों की कारें पसीने से लथपथ रिक्शावाले और अचानक कोई साईकिल सवार भी हर कोई भीड़ में से अपना रास्ता निकाल लेता है टचानक उसे चौंका... (Continue reading)
इश्क़ क़फ़न में लिपटा बादलों के छुपता सूरज अँधेरी कब्र में सो चुका था न जाने कब से अपने आप से रूठा सूरज एक आग के दरिया में बहते किनारे उफक के न जाने जलते रहे किसके लिए दिन के ढल जाने तक| कौन था वह? न जाने कबसे खड़ा था जो... (Continue reading)
कुछ पल दूर कहीं कोई छेड़े साज अन्तर्मन के खोल झरोखे मैं भी कुछ पल जी लूं आज । ओस कणों के पहनूं गहने अरुणाई से मांग भरूं लौट न आयें नयनन बदरा अधरों से कोई गीत बुनूं इन्द्र धनु की सतरंग लड़ियां मन अंगना में बांधूं आज वीणा... (Continue reading)
(शिरीष कुमार मौर्य को लक्ष्मण प्रसाद मंडलोई सम्मान पर ‘आखर’ की तरफ से बधाई.) जब रात के दो बजते हैं ! जब रात के दो बजते हैं प्रेम सो चुका होता है श्लथ होकर मेरे आसपास आती है उसके खर्राटों की हल्की-सी आवाज़ जब रात के... (Continue reading)
1) धर्म अपने -अपने धर्म के चप्पे … अपने- अपने धर्म की उँगुलियाँ हम चाट-चाट कर खा रहे हैं … स्वाद -स्वाद में पता नहीं चलता किसकी उँगुलियाँ किसका भेजा… और किसका जिगर हम उड़ा रहे हैं हम अपना धर्म निभा रहे हैं… 2) धूप मेरे हिस्से की धूप कौन निगल गया…. समय के समझौते पर हर बार कर्मों की मोहर लगी…! सभी हादसों को मेरे... (Continue reading)
बात करने का सलीका हो तो पत्थर बोले वर्ना तू कौन है तुझ से कोई क्योंकर बोले वो ख़ुदा है तो रहे दूर ही मुझ से कह दो पास आये तो ज़रा आदमी बन कर बोले मैं भी हर तरह के ज़ख्मों की ज़बां... (Continue reading)
(1) रूठें कैसे नहीं बचे अब मान मनोव्वल के रिश्ते अलगे-से चुपचाप चल रहे ये पल दो पल के रिश्ते . कभी गाँठ से बंध जाते हैं कभी गाँठ बन जाते हैं कब छाया कब चीरहरण, हो जाते आँचल के रिश्ते आते हैं सूरज बन, सूने में चह-चह भर जाते... (Continue reading)
आँगन भीतर का आँगन जब गन्दला गया, तो एक झाड़ू बनाया, जिसके तीलें हैं सोच के, बंधा है विवेक के धागों से. बुहार दी उससे …. अतृप्त इच्छायों की धूल, कुंठाओं की मिट्टी, वेदनाओं का कूड़ा, जलन की कर्कट. झाड़ दीं उससे… विद्रूपताओं और वर्जनाओं से सनी मन की खिड़कियाँ. ... (Continue reading)