Posts Tagged ‘व्यंग्य’

घपले से घोटाले तक (व्यंग्य)

घोटाला करना आजकल हमारे पारिवारिक गौरव का अविभाज्य अंग हो गया है. आधुनिक घोटालावादी संस्कृति के राष्ट्रीय प्रवर्तकों ने इसके सैद्धांतिक तथा व्यावहारिक पक्ष को इतनी मजबूती और गरिमा प्रदान कर दी है कि अब किसी भी देशभक्त के... (Continue reading)

प्रजातंत्र के खम्भे (व्यंग्य )

प्रजातंत्र के खम्भे (व्यंग्य )

प्रजातंत्र के खम्भे (व्यंग्य ) हमारे देश में प्रजातंत्र को स्थापित हुए कई साल बीते पर सत्ता का सुख इच्छाधारियो को नहीं मिल पा रहा है,कई परिवार टूट रहे है रिश्ते दम तोड़ रहे है,महत्वाकांक्षाए घुट रही है.प्रजातंत्र को बचाना है... (Continue reading)

जान लड़ा दूंगा (व्यंग्य रचना)

जान लड़ा दूंगा (व्यंग्य रचना)

एक घुटे-घुटाए,मंजे-मंजाये नेता का बेटा अपनी ही पार्टी के राज्य में पैसा खाते पकडा गया,बेचारे की सेहत देखकर अँधा भी बता सकता है की खाते-पीते घर का सपूत है. जैसा की अक्सर होता है नेताजी पहुंचे तांत्रिक बाबा की शरण में -”बाबा मुझे बचा लो,बाबा मुझे बचा लो मेरी उम्रभर की कमाई मिट्टी में मिल... (Continue reading)

धर्मनिरपेक्षता के ठेकेदार (व्यंग्य)

धर्मनिरपेक्षता के ठेकेदार (व्यंग्य)

वे सामाजिक व राजनैतिक दृष्टि से घोषित रूप से धर्मनिरपेक्ष थे. अक्सर अखबारों में उनकी धर्मनिरपेक्ष छवि फोटो समेत छपती रहती थी. शहर के प्रायः सभी   धर्मनिरपेक्षता सम्बन्धी समारोहों में वे ऐसी  ही प्रमुखता से सुशोभित होते थे जैसे किसी... (Continue reading)

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